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तारों के बीच बैठा मैं

रात चांदनी की चादर ओढ़े है,
तारे अपनी शाश्वत भाषा
में टिमटिमा रहे हैं,
और मैं खुले आसमान के नीचे
अपने ही भीतर के
आकाश को निहार रहा हूँ।
कल क्या था…?
आज क्या हो गया…?
और आने वाला कल
किस दिशा से मेरे द्वार
पर दस्तक देगा…?
इन प्रश्नों के अनगिन दीप
मन के निर्जन घाट पर जल उठे हैं।
देखता हूँ,दुनिया कितनी बदल गई है,
समय ने अपने पंखों में
असंख्य युगों की गति समेट ली है।
लोग मिट्टी की पगडंडियों से निकलकर
आकाश की ऊँचाइयों तक पहुँच गए,
विचारों ने सीमाएँ लाँघ लीं,
तकनीक ने दूरियों को
पराजित कर दिया।
पर मैं…? मैं वहीं खड़ा हूँ क्या,
जहाँ वर्षों पहले खड़ा था?
या फिर धीरे-धीरे चलते हुए इतना
आगे निकल आया हूँ
कि स्वयं को पहचान नहीं पा रहा?
तारों की भीड़ में बैठा
मैं अपने अस्तित्व का पता पूछता हूँ।
क्या दुनिया से पीछे छूट गया हूँ?
या भीड़ की अंधी दौड़
में शामिल न होकर
अपने समय से आगे निकल आया हूँ?
उत्तर कहीं बाहर नहीं मिलता।
हवा केवल इतना कहती है
“चलना ही प्रगति नहीं होता,
कभी-कभी ठहरकर स्वयं
को समझ लेना भी
एक यात्रा महान होती है।”
मैं देखता हूँ उन तारों को
वे लाखों वर्षों से वहीं हैं,फिर भी
कोई उन्हें पीछे नहीं कहता।
नदी बहती है,पर्वत स्थिर रहते हैं,
दोनों ही प्रकृति के सत्य हैं।
तब मन कहता है
शायद जीवन का अर्थ
दुनिया से आगे निकल जाने में नहीं,
अपने भीतर के सत्य के साथ
तालमेल बिठा लेने में है।
यदि आत्मा आज भी निर्मल है,
यदि संवेदनाएँ अब भी जीवित हैं,
यदि किसी की पीड़ा देखकर
हृदय अब भी पिघल जाता है,
तो समय की दौड़ में
मैं हारा नहीं हूँ।
रात और गहरी हो रही है,
तारे अब भी झिलमिला रहे हैं,
और मैं अपने प्रश्नों के साथ नहीं,
अपने उत्तरों के साथ बैठा हूँ।
क्योंकि समझ गया हूँ
दुनिया बदलना समय का स्वभाव है,
पर मनुष्य बने रहना ही
जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
और इस विराट आकाश के नीचे
आज पहली बार मुझे लगा
मैं कहीं रुका नहीं हूँ,
मैं अपनी ही गति से
जीवन के साथ चल रहा हूँ।
जीवन के साथ निभ रहा हूं।।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
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