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दोदपुर सिविल लाइन थाने के पीछे नगर निगम के सरकारी आवासो पर लोगों के  स्वामित्व को मा0उच्च न्यायालय ने अवैध क़रार कर अपील को किया खारिज़

अलीगढ़: दशकों से नगर निगम के दोदपुर सिविल लाइन थाने के पीछे बने सरकारी भवनों पर कब्जा जमाए लोगों को माननीय उच्च न्यायालय ने कोई राहत नहीं दी है साथ न्यायायल ने नगर आयुक्त नगर निगम को विधिवत नियमानुसार निर्धारित प्रक्रिया अपनाते हुए भवनों पर अपना कब्ज़ा लेने का अधिकार भी दिया है।

माननीय उच्च न्यायालय, इलाहाबाद द्वारा रिट-सी संख्या 24377/2026 (Shafiqur Rahman एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य) में पारित निर्णय के क्रम में नगर निगम अलीगढ़ द्वारा सिविल लाइन थाना क्षेत्र के पीछे स्थित नगर निगम के सरकारी आवासों को अवैध कब्जों से मुक्त कराने की कार्रवाई की जा रही है।

नगर आयुक्त प्रेम प्रकाश मीणा ने बताया कि माननीय उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया है कि संबंधित याचिकाकर्ता नगर निगम के आवासों पर अपना कोई वैध स्वामित्व, आवंटन, वैध किरायेदारी अथवा फ्रीहोल्ड अधिकार सिद्ध करने में असफल रहे हैं न्यायालय ने यह भी माना कि मात्र लंबे समय से कब्जा बनाए रखने से सार्वजनिक संपत्ति पर कोई वैधानिक अधिकार उत्पन्न नहीं होता। न्यायालय ने याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया और नगर निगम को विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करने का अधिकार प्रदान किया।

माननीय उच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय

कोर्ट ने अपने फैसले में सबसे बड़ा बिंदु यह उठाया कि याचिकाकर्ता अपने मालिकाना हक या रहने के अधिकार को लेकर खुद ही स्पष्ट नहीं थे।

पहला दावा: अपनी लिखित याचिका में उन्होंने खुद को नगर निगम का किराएदार बताया और कहा कि उनके पूर्वज नियमित रूप से किराया देते आ रहे थे।

दूसरा दावा: वहीं दूसरी ओर, बहस के दौरान उनके वकील ने तर्क दिया कि उन्होंने 1993 में फ्रीहोल्ड अधिकारों के लिए पैसा जमा किया था, जिससे वे वहां के वैध आवंटी बन गए।

न्यायालय ने कहा कि कानूनन आप एक ही समय पर किराएदार और मालिक (या फ्रीहोल्ड धारक) होने का दोहरा दावा नहीं कर सकते, और इन दोनों ही दावों को साबित करने के लिए ठोस दस्तावेजों की जरूरत होती है जो याचिकाकर्ता नहीं दे पाए।

कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं

उनके पास न तो कोई अलॉटमेंट लेटर था, न कोई रेंट एग्रीमेंट  न ही नगर निगम के हाउस रजिस्टर या म्यूनिसिपल रिकॉर्ड में उनका नाम दर्ज था।

रसीदों की हकीकत: उन्होंने जो रसीदें कोर्ट के सामने रखीं, वे असल में उस जमीन (प्लॉट नंबर 78 और 87) की थीं ही नहीं बल्कि वे किसी अन्य नजूल प्लॉट (नंबर 273 और 275) से संबंधित थीं। इसके अलावा उन रसीदों पर कहीं भी यह नहीं लिखा था कि यह पैसा क्वार्टर के किराए के रूप में लिया गया है।

राज्य सरकार ने इस विवादित जमीन की फ्रीहोल्ड डीड नगर निगम, अलीगढ़ के पक्ष में 26 सितंबर 2009 को निष्पादित की थी। 2009 तक खुद नगर निगम के पास उस जमीन का पूर्ण मालिकाना हक नहीं था तो याचिकाकर्ता 1993 में ही उस पर फ्रीहोल्ड अधिकार पाने का दावा कैसे कर सकते हैं? केवल बैंक या निगम में कोई रकम जमा कर देने से तब तक कोई कानूनी मालिकाना हक नहीं मिल जाता जब तक कि आपके नाम पर कोई आधिकारिक अलॉटमेंट या रजिस्ट्री न की गई हो।

न्यायालय ने एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को दोहराया कि महज लंबे समय तक कब्जा बनाए रखने से, भले ही वह कितने भी समय का हो, किसी सार्वजनिक या सरकारी संपत्ति पर कोई कानूनी अधिकार या टाइटल पैदा नहीं हो जाता”। चूंकि यह क्वार्टर नगर निगम के कर्मचारियों के रहने के लिए बनाए गए थे और याचिकाकर्ता वहां अवैध कब्जेधारी पाए गए इसलिए उन्हें हटाने का नोटिस पूरी तरह वैध है।

नगर आयुक्त के आदेश को वैध माना

उच्च न्यायालय ने नगर आयुक्त द्वारा 15.05.2026 को पारित आदेश को सही ठहराया क्योंकि उन्होंने याचिकाकर्ताओं को अपनी बात रखने का पूरा मौका दिया था। हालांकि, रिट याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने अंत में यह सुरक्षा जरूर दी कि नगर निगम जब भी उन्हें वहां से हटाए तो वह बल प्रयोग करने के बजाय कानून द्वारा तय की गई उचित प्रशासनिक प्रक्रिया का ही पालन करे।

नगर आयुक्त प्रेम प्रकाश मीणा ने कहा माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों के अनुपालन में नगर निगम, जिला प्रशासन एवं पुलिस प्रशासन की संयुक्त टीम द्वारा सरकारी आवासों को चरणबद्ध तरीके से अतिक्रमण मुक्त कराये जाने की कार्रवाई की गई है। कार्रवाई के दौरान विधि-व्यवस्था बनाए रखते हुए सभी आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया भी सुनिश्चित कराया गया।

उन्होंने कहा सरकारी संपत्तियां/शासकीय भवन जनहित की संपत्तियां हैं जिनका उपयोग केवल शासकीय सेवा में रहने वाले अधिकृत व्यक्तियों द्वारा ही किया जा सकता है। सार्वजनिक संपत्तियों पर किसी भी प्रकार का अवैध कब्जा स्वीकार्य नहीं है तथा भविष्य में भी ऐसे मामलों में माननीय न्यायालय के निर्देशों एवं  कानून के दायरे में कठोर कार्रवाई निरंतर जारी रहेगी।-@अहसन रब, मीडिया सहायक

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