NEW English Version

साहित्य, समाज सेवा और पर्यावरण चेतना को समर्पित वरिष्ठ पत्रकार,साहित्यकार सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” से विजय दुसेजा संपादक”हमर संगवारी” की विशेष बातचीत

( छत्तीसगढ़ राज्य स्तरीय साहित्यिक पत्रिकारिता सम्मान 2026 मिलने पर)

विजय दुसेजा  : आपकी लेखनी का मूल उद्देश्य क्या है?

सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” :

मेरे लिए लेखन केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व का निर्वहन है। साहित्य तभी सार्थक होता है जब वह मनुष्य को संवेदनशील बनाए, समाज को दिशा दे और आने वाली पीढ़ियों के लिए चेतना का दीप जलाए। मैंने हमेशा अपनी लेखनी को जनमानस की पीड़ा, प्रकृति की करुण पुकार और मानवीय मूल्यों के संरक्षण का माध्यम माना है। आज जब भौतिकता की अंधी दौड़ में संवेदनाएं क्षीण हो रही हैं, तब साहित्य ही मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने का सबसे बड़ा माध्यम है।

विजय दुसेजा: आपकी रचनाओं में समाज सेवा और मानवीय सरोकार प्रमुखता से दिखाई देते हैं। इसके पीछे क्या प्रेरणा रही?

“शाश्वत”

मैंने गांव, गरीब, किसान, मजदूर और आम जनजीवन को बहुत निकट से देखा है। समाज की वास्तविक समस्याएं केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि लोगों की आंखों के दर्द में दिखाई देती हैं। यही पीड़ा मेरी लेखनी की प्रेरणा बनती है। मेरा मानना है कि लेखक केवल दर्शक नहीं हो सकता, उसे समाज के संघर्षों का सहभागी बनना पड़ता है। यदि साहित्य समाज की व्यथा को स्वर नहीं देगा, तो उसकी प्रासंगिकता समाप्त हो जाएगी। मैंने हमेशा कोशिश की है कि मेरी रचनाएं केवल पढ़ी न जाएं, बल्कि लोगों के भीतर विचार और परिवर्तन की चेतना भी उत्पन्न करें।

विजय दुसेजा : आप पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी लगातार लिखते रहे हैं। वर्तमान समय में इसे आप कितना गंभीर विषय मानते हैं?

“शाश्वत” :

आज पर्यावरण केवल एक विषय नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है। जिस प्रकृति ने हमें जीवन दिया, उसी प्रकृति के साथ हमने सबसे अधिक अन्याय किया है। जंगल कट रहे हैं, नदियां प्रदूषित हो रही हैं, जलस्रोत समाप्त हो रहे हैं और मनुष्य विकास के नाम पर विनाश की ओर बढ़ रहा है। मुझे सबसे अधिक चिंता इस बात की है कि आने वाली पीढ़ियों को हम कैसी धरती सौंपेंगे। मैं मानता हूं कि पेड़ लगाना ही पर्यावरण संरक्षण नहीं है, बल्कि प्रकृति के प्रति संवेदनशील जीवनशैली अपनाना भी उतना ही आवश्यक है। जब तक मनुष्य प्रकृति को उपभोग की वस्तु समझता रहेगा, तब तक संकट गहराता जाएगा। प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व ही मानव सभ्यता का वास्तविक आधार है।

विजय दुसेजा: वर्तमान समय के साहित्य को आप किस दृष्टि से देखते हैं?

“शाश्वत” :

आज साहित्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती संवेदनाओं को बचाए रखने की है। तकनीक और सोशल मीडिया के दौर में शब्दों की संख्या बढ़ी है, लेकिन भावनाओं की गहराई कम होती जा रही है। साहित्य को केवल लोकप्रियता या त्वरित प्रसिद्धि तक सीमित नहीं होना चाहिए। एक सच्चा साहित्यकार वही है जो समय की विसंगतियों पर प्रश्न उठाए और समाज को सकारात्मक दिशा देने का साहस रखे।

मुझे खुशी है कि आज भी अनेक युवा साहित्य के माध्यम से सामाजिक चेतना को आगे बढ़ा रहे हैं। आवश्यकता केवल इतनी है कि साहित्य को मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज निर्माण के माध्यम के रूप में देखा जाए।

विजय दुसेजा : युवाओं और नई पीढ़ी को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?

“शाश्वत” :

युवा पीढ़ी किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति होती है। यदि युवा संवेदनशील, जागरूक और संस्कारवान होंगे तो समाज स्वतः मजबूत बनेगा। मैं युवाओं से यही कहना चाहता हूं कि वे अपनी मिट्टी, संस्कृति, प्रकृति और मानवीय मूल्यों से जुड़ें। केवल सफल होना ही जीवन का उद्देश्य नहीं होना चाहिए, बल्कि उपयोगी बनना भी उतना ही आवश्यक है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने भीतर करुणा, प्रेम, सहिष्णुता और सामाजिक जिम्मेदारी को जीवित रखें। मनुष्य का वास्तविक विकास तभी संभव है जब विज्ञान के साथ-साथ संवेदनाएं भी विकसित हों।

विजय दुसेजा : अंत में साहित्य और जीवन को लेकर आपकी क्या सोच है?

“शाश्वत” :

मेरे लिए जीवन एक सतत साधना है और साहित्य उसकी आत्मा। शब्द तभी जीवित रहते हैं जब उनमें सत्य, संवेदना और समाज के प्रति समर्पण हो। मैं मानता हूं कि कलम केवल लिखने का साधन नहीं, बल्कि परिवर्तन की शक्ति है। यदि हमारी लेखनी किसी एक व्यक्ति के भीतर भी सकारात्मक विचार जगा सके, किसी पीड़ित के आंसू पोंछ सके या प्रकृति के प्रति प्रेम जगा सके, तो वही साहित्य की सबसे बड़ी सफलता है। एवीके न्यूज सर्विस

Book Showcase

Best Selling Books

Ikigai: The Japanese secret to a long and happy life

By Héctor García, Francesc Miralles

₹318

Book 2 Cover

Why I am an Atheist and Other Works

By Bhagat Singh

₹104

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

Until Love Sets Us Apart

By Aditya Nighhot

₹176

Translate »