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 बाल सखा को भेंट की अपनी चर्चित पुस्तक “बोलती परछाइयाँ”, बचपन की यादें हुईं फिर जीवंत

वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं लेखक सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ ने अपने बाल सखा संजय शुक्ला के निवास पर पहुंचकर अपनी चर्चित संस्मरणात्मक कृति “बोलती परछाइयाँ” उन्हें सप्रेम भेंट की। यह अवसर केवल पुस्तक भेंट करने का नहीं, बल्कि दशकों पुरानी आत्मीय मित्रता, बचपन की स्मृतियों और भावनात्मक संबंधों को पुनः जीवंत करने का साक्षी बन गया। इस अवसर पर लेखक सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ ने अपने बाल्यकाल की अनेक अविस्मरणीय स्मृतियाँ साझा करते हुए कहा कि उनका और संजय शुक्ला का साथ बचपन से ही रहा है। दोनों पड़ोसी होने के कारण दिन-रात एक-दूसरे के साथ ही रहते थे। साथ-साथ विद्यालय जाना, एक ही कक्षा में बैठकर पढ़ाई करना, खेलना-कूदना, शरारतें करना और बाल सुलभ हर गतिविधि में सहभागी बनना उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा। बचपन की वही निष्कपट मित्रता आज भी उसी आत्मीयता के साथ कायम है।

उन्होंने भावुक होकर बताया कि वे आज भी अपने मित्र संजय शुक्ला को प्यार से “संजू” कहकर पुकारते हैं। विशेष बात यह है कि उनकी चर्चित पुस्तक “बोलती परछाइयाँ” के एक महत्वपूर्ण संस्मरण का मुख्य पात्र भी उनके यही बाल सखा संजू शुक्ला हैं। पुस्तक में अंकित घटनाएँ दोनों मित्रों के बचपन की सजीव स्मृतियों को शब्दों के माध्यम से अमर करती हैं। पुस्तक प्राप्त कर संजय शुक्ला भी भावुक हो उठे। उन्होंने कहा कि यह केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि उनके बचपन की अनमोल यादों का जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने सुरेश सिंह बैस का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि वर्षों पुरानी घटनाओं को इतने सुंदर और संवेदनशील ढंग से पुस्तक में स्थान देकर उन्होंने उनकी साझा स्मृतियों को हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर दिया है। पुस्तक के पन्ने पलटते ही बचपन की अनेक घटनाएँ मानो चलचित्र की भाँति आँखों के सामने सजीव हो उठीं। संजय शुक्ला ने कहा कि यह उनके लिए गर्व और अत्यंत खुशी का विषय है कि उनकी मित्रता और बचपन की यादें अब साहित्य का हिस्सा बन चुकी हैं। यह कृति आने वाली पीढ़ियों को भी सच्ची मित्रता, आत्मीयता और मानवीय रिश्तों की गरिमा का संदेश देती रहेगी। इस आत्मीय एवं भावनात्मक अवसर पर संजय शुक्ला के सुपुत्र वैभव शुक्ला भी उपस्थित रहे। उन्होंने भी लेखक सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ को बधाई देते हुए कहा कि ऐसी पुस्तकें केवल साहित्य नहीं, बल्कि परिवारों और पीढ़ियों को जोड़ने वाली अमूल्य धरोहर होती हैं।

उन्होंने इस अनूठे संस्मरण को सहेजने के लिए लेखक के प्रति आभार व्यक्त किया। यह मुलाकात साहित्य, मित्रता और मानवीय संवेदनाओं का ऐसा सुंदर संगम बन गई, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि समय भले ही बीत जाए, लेकिन सच्चे रिश्ते और उनसे जुड़ी यादें कभी पुरानी नहीं होतीं। “बोलती परछाइयाँ” के माध्यम से लेखक सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ ने न केवल अपने बचपन की स्मृतियों को शब्द दिए हैं, बल्कि मित्रता के उस अमूल्य रिश्ते को भी साहित्य में स्थायी स्थान प्रदान किया है। इस अवसर पर यह भी बताते चलें की संजय शुक्ला के बड़े भ्राता केशव शुक्ला वरिष्ठ साहित्यकार व पत्रकार हैं, जो आज भी साहित्य साधना में रत हैं। ए वी के न्यूज़ सर्विस 

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