ज्ञानामृत का पान हमें, प्रति
दिवस कराते हैं गुरुवर।
शिष्य बने कंगूरा, नींव शिला
बन जाते हैं गुरुवर।
सदा ही अपना धर्म निभाते,
सरस्वती के साधक गुरु।
सकल विश्व में नित ही रचाते,
नव इतिहास ये प्रेरक गुरु।
दूर तिमिर का कर जीवन से,
ज्योति अखंड जलाते गुरु।
सूरज सा तपकर हर पल ही,
ज्ञान रश्मि बिखराते गुरु।
ब्रह्मा,विष्णु,महेश सभी से,
उच्च मिला इनको स्थान।
ज्ञान की गंगा बहाने वाले,
गुरुवर ही हैं सबसे महान।
गुरुवर का गुणगान करें,
शब्दों में इतनी शक्ति कहां?
गीत लिखें गुरुवर पर कैसे,
हममें वह अभिव्यक्ति कहां?
एकलव्य सी होती है अब,
शिष्यों में अनुरक्ति कहां?
राम,कृष्ण,अर्जुन सम जग में,
ढूंढें ऐसे व्यक्ति कहां?
जननी है गुरु, पिता भी हैं गुरु,
समस्त अध्यापक भी गुरु।
जिनसे भी कुछ सीखा हमने,
वो सब भी हैं हमारे गुरु।
माता,पिता और गुरुवर सबको,
बारम्बार नमन वंदन है।
शीश नवाते श्रद्धा से हम,
सबको हमारा अभिनंदन है !!!

लेखक के बारे में : स्मृति श्रीवास्तव का तृतीय काव्य संग्रह डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित “अन्तर्ध्वनि” समकालीन हिंदी काव्यधारा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में उभरता है। हिंदी साहित्य में एम.ए. उपाधि प्राप्त करने के उपरांत लेखिका ने अपना जीवन हिंदी भाषा, भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संवर्धन को समर्पित किया है। नई दिल्ली के सेंट थॉमस स्कूल में दो दशकों तक हिंदी एवं संस्कृत का अध्यापन, दिल्ली विश्वविद्यालय के नेत्रहीन विद्यार्थियों के लिए दुर्लभ ग्रंथों का वाचन-रिकॉर्डिंग तथा वंचित महिलाओं के लिए सामाजिक सक्रियता—इन सभी अनुभवों की गहन मानवीय संवेदना इस कृति की पंक्तियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।

