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ऐश्वर्य एवं वैराग्य का अद्भुत संगम है श्रीकृष्ण

भगवान श्रीकृष्ण भारत की माटी, भारत की आत्मा और भारत के जनजीवन की धड़कन हैं। वे केवल आराधना के देवता नहीं, बल्कि जीवन को देखने की एक दृष्टि, संघर्षों से जूझने की प्रेरणा और भविष्य की ओर बढ़ने की दिशा हैं। वे ऐश्वर्य एवं वैराग्य का अद्भुत एवं निराला संगम हैं। श्रीकृष्ण के बिना भारतीय जीवन-दर्शन की कल्पना अधूरी है। जीवन के लगभग प्रत्येक आयाम-परिवार, समाज, राजनीति, प्रशासन, अर्थव्यवस्था, युद्ध, शांति, प्रेम, मित्रता, कर्तव्य, त्याग, नेतृत्व और आध्यात्मिकता में श्रीकृष्ण के विचारों और आदर्शों की छाप दिखाई देती है। इसीलिए जन्माष्टमी केवल श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि उनके विचारों को जीवन में उतारने का अवसर है। श्रीकृष्ण भारतीय संस्कृति के ऐसे अद्भुत एवं विलक्षण महानायक हैं, जिनके व्यक्तित्व में विरोधाभास दिखाई देने वाले अनेक गुण एक साथ समाहित हो जाते हैं। वे द्वारका के शासक हैं, लेकिन उन्हें सामान्यतः ‘राजा श्रीकृष्ण’ नहीं कहा जाता। वे ब्रजनंदन हैं, नंदलाल हैं, कन्हैया हैं, माखनचोर हैं, गोपियों के चितचोर हैं और रासरचैया हैं। यही उनकी महानता है कि सत्ता के शिखर पर पहुंचकर भी वे जनमानस से कभी दूर नहीं हुए। उनका नेतृत्व राजमहलों तक सीमित नहीं था, वह गांवों की गलियों, ग्वाल-बालों, किसानों, पशुपालकों और सामान्य जन के हृदय तक पहुंचता था।

श्रीकृष्ण का जीवन हमें सिखाता है कि श्रेष्ठ नेतृत्व केवल अधिकार प्राप्त करने का नाम नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाने की कला है। उन्होंने सत्ता को कभी व्यक्तिगत सुख का साधन नहीं बनाया। समाज और राष्ट्र की व्यवस्था उनके लिए कर्तव्य थी और धर्म उनकी आत्मनिष्ठा। इसीलिए उन्होंने परिस्थितियों से पलायन नहीं किया। जहां प्रेम की आवश्यकता थी वहां प्रेम दिया, जहां मित्रता की आवश्यकता थी वहां मित्र बने, जहां संवाद जरूरी था वहां संवाद किया और जहां अधर्म का प्रतिकार आवश्यक हुआ वहां अत्यंत कठोर होकर सामने आए। यही संतुलन कुशल नेतृत्व की सबसे बड़ी पहचान है। आज प्रबंधन की दुनिया में निर्णय क्षमता, समय-प्रबंधन, संकट-प्रबंधन, नेतृत्व, संवाद-कौशल, मनोविज्ञान और रणनीति को सफलता की अनिवार्य शर्त माना जाता है। इन सभी क्षेत्रों में श्रीकृष्ण का जीवन असाधारण उदाहरण प्रस्तुत करता है। कुरुक्षेत्र में अर्जुन जब मोह और मानसिक द्वंद्व से घिरकर अपने कर्तव्य से विमुख होने लगे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें केवल युद्ध के लिए प्रेरित नहीं किया, बल्कि जीवन का विराट दर्शन दिया। उन्होंने अर्जुन को कर्म का मर्म समझाया-मनुष्य का अधिकार कर्म पर है, परिणाम पर नहीं। यह संदेश आज भी हर विद्यार्थी, कर्मचारी, उद्यमी, प्रशासक, राजनीतिज्ञ और सामान्य व्यक्ति के लिए उतना ही उपयोगी है।

हमारी सबसे बड़ी कमजोरी अक्सर कर्म से अधिक परिणाम की चिंता होती है। परिणाम की चिंता मन को भय, तनाव और असमंजस से भर देती है। श्रीकृष्ण का कर्मयोग इस मानसिक बोझ से मुक्ति का मार्ग देता है। अपने कर्तव्य को पूरी निष्ठा, क्षमता और ईमानदारी से करना और परिणाम को व्यापक व्यवस्था पर छोड़ देना-यह जीवन-प्रबंधन का ऐसा सूत्र है जिसकी उपयोगिता कभी समाप्त नहीं हो सकती। श्रीकृष्ण की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक थी-स्थिर बुद्धि। शिशुपाल ने राजसूय यज्ञ की सभा में उन्हें लगातार अपमानित किया, फिर भी वे शांत रहे। दुर्योधन के दरबार में शांति-दूत बनकर गए और वहां भी उनका अपमान हुआ, लेकिन वे विचलित नहीं हुए। इससे हमें सीख मिलती है कि उत्तेजना में लिया गया निर्णय प्रायः समस्या बढ़ाता है, जबकि शांत मन समाधान का रास्ता खोलता है। आधुनिक परिवारों से लेकर संसद, प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक, यह प्रबंधन-सूत्र आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
श्रीकृष्ण केवल युद्धनीति के ज्ञाता नहीं थे, वे शांति के भी सबसे बड़े समर्थक थे।

महाभारत का युद्ध उनकी पहली पसंद नहीं था। उन्होंने युद्ध रोकने के लिए हर संभव प्रयास किया। जब संवाद और न्याय की संभावनाएं समाप्त हो गईं, तभी धर्म की रक्षा के लिए युद्ध का मार्ग स्वीकार किया गया। इससे स्पष्ट होता है कि शक्ति का अर्थ हिंसा नहीं, बल्कि न्याय की रक्षा करने की क्षमता है। सच्ची शांति वही है जिसके पीछे न्याय और आत्मबल की शक्ति हो। श्रीकृष्ण का सामाजिक दृष्टिकोण भी अत्यंत व्यापक था। उन्होंने ग्रामीण जीवन, गौ-संस्कृति, प्रकृति और सामुदायिक जीवन को सम्मान दिया। गोवर्धन प्रसंग हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सामुदायिक एकता का संदेश देता है। माखन और दूध-दही के प्रसंगों को केवल बाल-क्रीड़ा के रूप में देखने के बजाय उनमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्थानीय संसाधनों की रक्षा का संदेश भी देखा जा सकता है। श्रीकृष्ण का लोकजीवन से जुड़ाव बताता है कि कोई भी राष्ट्र तभी मजबूत बन सकता है जब उसकी विकास-यात्रा गांवों, किसानों, श्रमिकों और सामान्य नागरिकों को साथ लेकर चले। उनका व्यक्तित्व एक अद्भुत समन्वय है।

वे अर्जुन के सारथी हैं और साथ ही विश्वरूप के दर्शन कराने वाले योगेश्वर। वे सुदामा के मित्र हैं और अत्याचारियों के लिए सुदर्शन चक्रधारी। वे बांसुरी की मधुरता हैं तो धर्मरक्षा के लिए आवश्यक कठोरता भी। वे प्रेम हैं, करुणा हैं, नीति हैं, रणनीति हैं, त्याग हैं और कर्म हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण को किसी एक सीमा में बांधना उनके विराट व्यक्तित्व को छोटा करना होगा। श्रीकृष्ण का एक महत्वपूर्ण संदेश है कि व्यक्ति को अपनी क्षमताओं का बहुआयामी विकास करना चाहिए। परंपरा में उनके द्वारा चौंसठ कलाओं के ज्ञान का उल्लेख मिलता है। इसका व्यापक संदेश यह है कि शिक्षा केवल रोजगार पाने का साधन नहीं, बल्कि व्यक्तित्व को पूर्ण बनाने की प्रक्रिया है। आज के समय में जब शिक्षा को केवल अंक, नौकरी और प्रतियोगिता तक सीमित करने का खतरा है, श्रीकृष्ण का जीवन हमें ज्ञान, कला, कौशल, सृजनशीलता और चरित्र के समन्वय की प्रेरणा देता है। श्रीकृष्ण की राजनीति सत्ता प्राप्ति की राजनीति नहीं, बल्कि लोककल्याण और धर्मस्थापना की राजनीति थी।

उनके जीवन में हमें यह सूत्र मिलता है कि सत्ता पर नैतिकता का अंकुश होना चाहिए और शक्ति का उपयोग जनहित के लिए होना चाहिए। आज भारत विकसित भारत के 2047 के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। आर्थिक शक्ति, विज्ञान, तकनीक, रक्षा, शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक समरसता-हर क्षेत्र में भारत नई संभावनाओं की ओर बढ़ रहा है। ऐसे समय में श्रीकृष्ण का दर्शन हमें बताता है कि विकास केवल भौतिक समृद्धि का नाम नहीं है। विकास तब सार्थक होगा जब उसमें चरित्र होगा, कर्तव्य होगा, करुणा होगी, न्याय होगा और अंतिम व्यक्ति के जीवन में भी आशा का प्रकाश पहुंचेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आत्मनिर्भर और सशक्त भारत के निर्माण की जो व्यापक यात्रा चल रही है, उसमें श्रीकृष्ण के कर्म, कर्तव्य, रणनीति, राष्ट्रहित और लोककल्याण के आदर्शों से प्रेरणा लेने की बड़ी संभावनाएं हैं।

अंतरराष्ट्रीय जीवन में भी श्रीकृष्ण का संदेश महत्वपूर्ण है। आज दुनिया संघर्षों, युद्धों, अविश्वास और शक्ति-संघर्षों से जूझ रही है। ऐसे समय में श्रीकृष्ण की नीति कहती है-पहले संवाद, फिर समन्वय और अंततः न्याय की रक्षा के लिए आवश्यक शक्ति। भारत यदि विश्व में शांति, सह-अस्तित्व और मानवकल्याण का मार्ग प्रशस्त करना चाहता है तो उसे अपनी सांस्कृतिक चेतना के इस महान स्रोत से ऊर्जा लेनी होगी। श्रीकृष्ण हमें यह भी सिखाते हैं कि जीवन केवल सुख का नाम नहीं है। संघर्ष आएंगे, परिस्थितियां बदलेंगी, प्रियजन दूर होंगे, संकट सामने खड़े होंगे, लेकिन मनुष्य को अपने धर्म और कर्तव्य से विचलित नहीं होना चाहिए। यही कारण है कि गीता का संदेश किसी एक युग, धर्म या समुदाय के लिए नहीं, बल्कि समूची मानवता के लिए जीवन का मार्गदर्शन बन गया है।

जन्माष्टमी के अवसर पर हमें केवल मंदिरों में घंटियां नहीं बजानी हैं, बल्कि अपने भीतर के अंधकार को भी पहचानना है। हमारे भीतर का कंस अहंकार हो सकता है, लोभ हो सकता है, क्रोध हो सकता है, भय हो सकता है और स्वार्थ भी। हमारे भीतर का अर्जुन भ्रमित और कमजोर हो सकता है। ऐसे में हमें अपने भीतर के श्रीकृष्ण को जगाना होगा-विवेक के रूप में, कर्म के रूप में, साहस के रूप में, प्रेम के रूप में और सत्य के रूप में। श्रीकृष्ण कोई बीता हुआ इतिहास नहीं हैं। वे भारतीय चेतना की सतत प्रवाहित जीवन-ऊर्जा हैं। वे केवल एक महानायक नहीं, बल्कि जीवन के महाप्रबंधक हैं। केवल धर्म के उपदेशक नहीं, बल्कि कर्म की प्रेरणा हैं। केवल बांसुरी की मधुर धुन नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध उठने वाला सुदर्शन भी हैं। श्रीकृष्ण एक व्यक्ति नहीं, एक दृष्टि हैं। श्रीकृष्ण एक कथा नहीं, एक चेतना हैं। श्रीकृष्ण केवल आराध्य नहीं, जीवन को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा हैं।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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