दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला छात्र पीजी भवन के ढहने की घटना ने राजधानी की भवन सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार हादसे में सात लोगों की मौत हुई है और कई लोग घायल हुए हैं। भवन मालिक हरिराम बंसल को पुलिस ने भिवाड़ी से हिरासत में लिया है और मामले की जांच जारी है। दिल्ली नगर निगम की ओर से अधिकारियों के खिलाफ भी विभागीय कार्रवाई किए जाने की जानकारी सामने आई है।
हादसे के बाद भवन मालिक के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है, लेकिन इससे एक बड़ा सवाल समाप्त नहीं होता। वह यह है कि यदि भवन में निर्माण संबंधी अनियमितताएं थीं, संरचनात्मक बदलाव किए जा रहे थे या सुरक्षा से जुड़ी कोई गंभीर कमी मौजूद थी, तो उसका पता हादसे से पहले क्यों नहीं चला। यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि इन सभी मामलों में किसी अधिकारी की लापरवाही थी, लेकिन यह निश्चित रूप से जांच का विषय है कि निगरानी व्यवस्था ने संभावित जोखिम को समय रहते क्यों नहीं पहचाना।
सत्य निकेतन दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिणी परिसर के आसपास विद्यार्थियों का महत्वपूर्ण क्षेत्र है। देश के विभिन्न हिस्सों से युवा यहां पढ़ाई और बेहतर भविष्य के लिए आते हैं। सीमित हॉस्टल सुविधाओं के कारण बड़ी संख्या में विद्यार्थी निजी पीजी और किराये के मकानों में रहते हैं। उनके परिवारों के लिए यह भरोसा स्वाभाविक है कि जिस भवन में उनका बेटा या बेटी रह रहा है, वह रहने के लिहाज से सुरक्षित होगा। इसलिए छात्र आवासों की सुरक्षा को केवल निजी संपत्ति का मामला मानना उचित नहीं है। यह सीधे सार्वजनिक सुरक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारी से जुड़ा विषय है।
सत्य निकेतन हादसे की जांच में सबसे पहले भवन की वास्तविक स्थिति और उसकी स्वीकृत स्थिति के बीच अंतर स्पष्ट किया जाना चाहिए। भवन का नक्शा क्या था, कितनी मंजिलों की अनुमति थी, वास्तविक निर्माण कितना था, भवन का उपयोग किस उद्देश्य के लिए स्वीकृत था और क्या उसमें बाद में कोई परिवर्तन किया गया, इन सवालों के जवाब जरूरी हैं। इसी तरह यदि बेसमेंट या भवन के किसी अन्य हिस्से में निर्माण अथवा मरम्मत का काम चल रहा था तो उसके लिए आवश्यक अनुमति थी या नहीं, यह भी जांच का विषय होना चाहिए।
इसके साथ प्रशासनिक निगरानी की भूमिका की पड़ताल भी आवश्यक है। संबंधित विभागों ने भवन का निरीक्षण कब किया था, निरीक्षण में क्या पाया गया, क्या कोई शिकायत पहले प्राप्त हुई थी और यदि शिकायत मिली थी तो उस पर क्या कार्रवाई की गई, इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए। किसी अधिकारी को केवल हादसा होने के आधार पर दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन जांच में यदि कर्तव्य में स्पष्ट चूक या नियमों की अनदेखी प्रमाणित होती है तो जिम्मेदारी तय होना भी उतना ही जरूरी है।
इस मामले की गंभीरता को वर्ष 2022 की सत्य निकेतन घटना के संदर्भ में भी देखना चाहिए। उस समय निर्माणाधीन चार मंजिला इमारत गिरने से दो मजदूरों की मौत हुई थी और अन्य लोग घायल हुए थे। पिछली घटना के बाद क्षेत्र में भवन सुरक्षा और निर्माण गतिविधियों को लेकर क्या कदम उठाए गए, इसका आकलन आज की घटना के संदर्भ में किया जाना चाहिए। किसी दुर्घटना के बाद कुछ समय के लिए कार्रवाई करने से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उसके कारणों से सीख लेकर व्यवस्था में स्थायी सुधार किया जाए।
दिल्ली में जुलाई 2024 का राजेंद्र नगर बेसमेंट हादसा भी भवन के निर्धारित उपयोग, सुरक्षा मानकों और प्रशासनिक निगरानी को लेकर गंभीर प्रश्न छोड़ गया था। इन घटनाओं को एक दूसरे से जोड़ते समय तथ्यों का ध्यान रखना जरूरी है, लेकिन यह भी देखना होगा कि क्या राजधानी के उन इलाकों में पर्याप्त सुरक्षा तंत्र मौजूद है जहां बड़ी संख्या में विद्यार्थी पीजी और किराये के भवनों में रहते हैं।
माननीय मुख्यमंत्री जी, सत्य निकेतन हादसा दिल्ली की भवन सुरक्षा नीति की व्यापक समीक्षा का अवसर है। छात्र पीजी, हॉस्टल और पुराने भवनों की पहचान कर उनका संरचनात्मक सुरक्षा ऑडिट कराया जाना चाहिए। केवल भवन की बाहरी स्थिति देखना पर्याप्त नहीं होगा। स्वीकृत नक्शे, वास्तविक निर्माण, भवन के उपयोग, अग्नि सुरक्षा और किए गए संरचनात्मक बदलावों की भी जांच आवश्यक है।
साथ ही ऐसी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है जिसमें किसी भवन के संबंध में शिकायत मिलने पर उसकी जांच और कार्रवाई की स्पष्ट समय सीमा हो। जिम्मेदार विभागों के बीच समन्वय भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। यदि किसी भवन में गंभीर अनियमितता पाई जाती है तो केवल नोटिस जारी करना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। खतरे की स्थिति में वहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए समयबद्ध निर्णय लिया जाना चाहिए।
यह भी जरूरी है कि जांच केवल तत्काल कारणों तक सीमित न रहे। भवन क्यों गिरा, यह जानना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण यह समझना है कि वह स्थिति पैदा कैसे हुई और उसे समय रहते रोका क्यों नहीं जा सका। यदि निर्माण में नियमों का उल्लंघन हुआ तो उसकी निगरानी किस स्तर पर हुई। यदि भवन जोखिमपूर्ण था तो उसका आकलन क्यों नहीं हुआ। यदि कोई शिकायत थी तो उसका निपटारा किस प्रकार हुआ। इन्हीं सवालों के जवाब भविष्य की त्रासदियों को रोकने में मदद करेंगे।
हादसे में जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों के लिए यह घटना अपूरणीय क्षति है। राहत और मुआवजा जरूरी हो सकते हैं, लेकिन किसी व्यक्ति की जान का विकल्प नहीं हो सकते। परिवारों को वास्तविक न्याय तभी मिलेगा जब घटना के कारणों की निष्पक्ष जांच हो और जिस स्तर पर भी जिम्मेदारी प्रमाणित हो, वहां नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
सत्य निकेतन हादसे को केवल एक और इमारत गिरने की घटना बनाकर भुला देना सबसे बड़ी विफलता होगी। दिल्ली को ऐसी प्रशासनिक संस्कृति की जरूरत है जिसमें कार्रवाई हादसे के बाद नहीं, बल्कि खतरे के दिखाई देने पर हो। सरकार और संबंधित एजेंसियों को अब यह सुनिश्चित करना चाहिए कि छात्र बहुल क्षेत्रों में रहने वाले युवाओं की सुरक्षा किसी भवन मालिक की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तक सीमित न रहे, बल्कि एक प्रभावी और जवाबदेह सार्वजनिक व्यवस्था का हिस्सा बने।
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सत्य निकेतन की इमारत क्यों गिरी। असली सवाल यह है कि यदि भवन में कोई जोखिम मौजूद था तो उसे समय रहते पहचाना क्यों नहीं गया। इस सवाल का तथ्यात्मक और निष्पक्ष उत्तर ही इस हादसे में जान गंवाने वालों के प्रति सबसे बड़ी जिम्मेदारी होगी।
