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जैविक अणुओं के स्व-संयोजन से हरित हाइड्रोजन उत्पादन की नई राह

बेंगलुरु: सौर ऊर्जा से हरित हाइड्रोजन के उत्पादन को अधिक टिकाऊ और किफायती बनाने की दिशा में भारतीय वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण प्रगति की है। बेंगलुरु स्थित सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज (सीईएनएस) के शोधकर्ताओं ने पूरी तरह धातु-मुक्त कार्बनिक पदार्थ तैयार किया है, जो सूर्य के प्रकाश की मदद से जल से हाइड्रोजन उत्पादन की प्रक्रिया को बेहतर बनाने की क्षमता रखता है।

इस शोध की खासियत यह है कि वैज्ञानिकों ने किसी महंगी या दुर्लभ धातु पर निर्भर रहने के बजाय प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले अमीनो एसिड एस्पार्टिक एसिड को प्रकाश-अवशोषित करने वाले कार्बनिक अणु पेरीलीन डायइमाइड (पीडीआई) के साथ जोड़ा। इन अणुओं को पानी में स्वतः व्यवस्थित होने दिया गया, जिससे एक सुव्यवस्थित नैनोसंरचना तैयार हुई।

अणुओं का खुद व्यवस्थित होना बना सफलता की कुंजी

शोधकर्ताओं के अनुसार, इस सामग्री के बेहतर प्रदर्शन के पीछे केवल इसकी रासायनिक संरचना नहीं, बल्कि अणुओं का एक-दूसरे के साथ व्यवस्थित होने का तरीका महत्वपूर्ण है। एस्पार्टिक एसिड वाला हिस्सा मजबूत हाइड्रोजन बंधन बनाने में मदद करता है, जबकि पीडीआई प्रकाश को प्रभावी ढंग से अवशोषित करने और अणुओं के बीच π–π स्टैकिंग को बढ़ावा देता है।

इन दोनों घटकों की परस्पर क्रिया से अणु एक व्यवस्थित सुप्रामॉलिक्यूलर संरचना में बदल जाते हैं। शोधकर्ताओं ने एस्पार्टिक एसिड-फंक्शनलाइज्ड पीडीआई अणुओं को जल में स्व-संयोजित कर अत्यधिक सुव्यवस्थित द्विआयामी नैनोशीट्स तैयार कीं।

यानी इस प्रक्रिया में अणु अपनी मूल रासायनिक पहचान बदले बिना एक ऐसी संरचना में व्यवस्थित हो गए, जिसने उनके कार्यात्मक गुणों को बेहतर कर दिया।

बिना रासायनिक बदलाव के प्रकाश अवशोषण में सुधार

शोध में सामने आया कि इस स्व-संयोजन से सामग्री की प्रकाश अवशोषण क्षमता का दायरा बढ़ा। साथ ही, प्रकाश के कारण उत्पन्न आवेशों के पृथक्करण और उनके परिवहन में भी सुधार हुआ। इससे ऊर्जा की अनावश्यक हानि कम करने और उत्प्रेरक अभिक्रियाओं के लिए उपलब्ध सतह क्षेत्र बढ़ाने में मदद मिली।

सौर ऊर्जा से जल-विभाजन के परीक्षण में स्व-संयोजित सामग्री ने अपने थोक रूप की तुलना में लगभग 18 प्रतिशत अधिक फोटोकरंट उत्पन्न किया। यह अंतर इस बात का संकेत है कि नियंत्रित आणविक संगठन धातु-मुक्त कार्बनिक फोटोकैटेलिस्ट के प्रदर्शन को उल्लेखनीय रूप से प्रभावित कर सकता है।

डीएफटी गणनाओं से भी हुई पुष्टि

शोधकर्ताओं ने उन्नत विद्युत-रासायनिक परीक्षणों के साथ डेंसिटी फंक्शनल थ्योरी (डीएफटी) आधारित गणनाओं का भी इस्तेमाल किया। इन अध्ययनों से संकेत मिला कि स्व-संयोजन सामग्री में अधिक प्रभावी आवेश परिवहन के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाता है।

एस्पार्टिक एसिड आणविक द्विध्रुव आघूर्ण को बढ़ाने में भी भूमिका निभाता है। इससे प्रकाश के संपर्क में आने पर उत्पन्न आवेशों का पृथक्करण अधिक प्रभावी ढंग से हो सकता है। यही प्रक्रिया जल-विभाजन के दौरान हाइड्रोजन निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है।

महंगी धातुओं पर निर्भरता घटाने की संभावना

हरित हाइड्रोजन को स्वच्छ ऊर्जा के महत्वपूर्ण विकल्पों में गिना जाता है। सौर ऊर्जा से जल का हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजन इसका एक प्रमुख मार्ग है, लेकिन इसके लिए इस्तेमाल होने वाले कई मौजूदा प्रकाश-उत्प्रेरक अकार्बनिक अर्धचालकों या महंगी धातुओं पर आधारित हैं। लागत, निर्माण की जटिलता और दीर्घकालिक स्थिरता जैसे मुद्दे इनके व्यापक उपयोग में चुनौती बने हुए हैं।

ऐसे में प्राकृतिक जैविक अणुओं को आधार बनाकर तैयार की गई यह रणनीति अलग दिशा प्रस्तुत करती है। शोध से यह संकेत मिलता है कि अमीनो एसिड जैसे प्राकृतिक अणु केवल रासायनिक निर्माण खंड नहीं हैं, बल्कि वे अणुओं के संगठन और अंतिम सामग्री के प्रकाश-उत्प्रेरक गुणों को नियंत्रित करने में भी उपयोगी हो सकते हैं।

भविष्य के सौर ईंधन के लिए संभावनाएं

यह शोध सीईएनएस, बेंगलुरु में डॉ. गौतम घोष और डॉ. आशुतोष के. सिंह के नेतृत्व में श्री सौरव मोयरा, श्री कुमार शुभम और सुश्री अथिरा चंद्रन एम. के सहयोग से किया गया। शोधपत्र जर्नल ऑफ मैटेरियल्स केमिस्ट्री ए में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस प्रकार की धातु-मुक्त स्व-संयोजित सामग्री भविष्य में हरित हाइड्रोजन उत्पादन के अलावा कृत्रिम प्रकाश संश्लेषण, सौर ईंधन उत्पादन और नई पीढ़ी के नवीकरणीय ऊर्जा उपकरणों के विकास में उपयोगी हो सकती है।

प्रकाशन लिंक : https://doi.org/10.1039/d6ta04378j

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