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शांति ही नहीं, सह-जीवन के लिये जरूरी है सहिष्णुता

-अंतर्राष्ट्रीय सहिष्णुता दिवस -16 नवम्बर, 2025-

विश्व में सहिष्णुता को बढ़ावा देने और जन-जन में शांति, सहनशीलता, स्वस्थता एवं संवेदना के लिये जागरूकता फैलाने के लिए हर वर्ष 16 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय सहिष्णुता दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य संसार में हिंसा, युद्ध एवं आतंक की भावना और नकारात्मकता को खत्म कर अहिंसा को बढ़ावा देना है। दुनिया में बढ़ते अत्याचार, आतंक, हिंसा और अन्याय को रोकने और लोगों को सहनशीलता और सहिष्णुता के प्रति जागरूकता की भावना जगाने के लिये इस दिवस की विशेष प्रासंगिकता है। यह दिवस सभी धर्मों और अलग-अलग संस्कृतियों को एक होने की प्रेरणा देता है। यह केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि मानवता के भविष्य को बचाने की अनिवार्य पुकार है।

शांति ही नहीं, सह-जीवन के लिये जरूरी है सहिष्णुता

जिस समय दुनिया विकास और तकनीक की ऊँचाइयों को छू रही है, उसी समय वह असहिष्णुता, हिंसा, युद्ध, आतंक और आक्रोश की गहराइयों में डूबती भी जा रही है। यह विरोधाभास बताता है कि मनुष्य बाहरी रूप से कितना भी समर्थ हो जाए, लेकिन यदि भीतर सहिष्णुता, धैर्य और संवेदना का प्रकाश न हो, तो सभ्यताएँ चमकते हुए भी विघटन के कगार पर खड़ी हो सकती हैं। आज के तनावपूर्ण वातावरण में सहिष्णुता मानवीय संबंधों को जोड़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है। यह कमजोरी नहीं, बल्कि वह आंतरिक सामर्थ्य है जो हमें अपने विचारों के साथ दूसरों के विचारों को समझने, स्वीकारने और सम्मान देने की क्षमता प्रदान करती है।

व्यक्तियों, समाजों एवं राष्ट्रों की एक दूसरे के लिये बढ़ती असहिष्णुता ही युद्ध, नफरत एवं द्वेष का कारण है, यही साम्प्रदायिक हिंसा एवं उन्माद का भी कारण है। असहिष्णुता, घृणास्पद भाषण और दूसरों के प्रति भय, नफरत, घृणा एवं द्वेष न केवल संघर्ष और युद्धों का एक शक्तिशाली प्रेरक है, बल्कि इसका मुख्य कारण भी है। जबकि सहिष्णुता वह बाध्यकारी शक्ति है जो हमारे बहुसांस्कृतिक, बहुजातीय और बहुधार्मिक समाज को एकजुट करती है। असहिष्णुता केवल सामाजिक एवं राजनैतिक ताने-बाने को ही छिन्न-भिन्न नहीं करती है, बल्कि इसका देश की अर्थव्यवस्था, उसके विकास एवं अंतर्राष्ट्रीय छवि पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। वैश्वीकरण के युग में अंतर्राष्ट्रीय वित्त एवं व्यापार व्यवस्था को मजबूती देने के लिये सहिष्णुता की बड़ी जरूरत है। यह व्यक्तिगत जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है। दरअसल, बदलते लाइफस्टाइल और सामाजिक माहौल की वजह से लोगों के अंदर सहनशीलता लगातार घटती जा रही है।

दुनिया भर में बढ़ते युद्ध, धार्मिक कट्टरता, नस्लीय संघर्ष, जातीय टकराव और सोशल मीडिया पर फैलती नफरत इस बात का प्रमाण हैं कि असहिष्णुता की आग कितनी तेजी से फैल रही है। ऐसे वातावरण में सहिष्णुता केवल सामाजिक मूल्य नहीं, बल्कि मानवता का आधार बन जाती है। मनुष्य जब संवाद खो देता है, जब सुनने की संस्कृति कमजोर पड़ जाती है, जब व्यक्तिगत अहंकार सामूहिक सद्भाव पर भारी पड़ने लगता है, तब असहिष्णुता जन्म लेती है। यही कारण है कि आज की दुनिया में सबसे बड़ी कमी है-संवाद, धैर्य और विविधता को सम्मानपूर्वक स्वीकारने की क्षमता। सहिष्णुता केवल अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए आवश्यक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जीवन की भी अनिवार्यता है। घरों में तनाव बढ़ रहा है क्योंकि हम दूसरों की बात सुनने का धैर्य खोते जा रहे हैं। रिश्ते टूट रहे हैं क्योंकि हम भिन्नता को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं। आधुनिक मनुष्य तेजी से प्रतिक्रियाशील हो गया है; छोटी-सी आलोचना भी उसे अस्थिर कर देती है। यदि हम अपने भीतर सहिष्णुता का दीपक जलाएँ, तो जीवन सरल, सुंदर और शांतिमय हो सकता है।

विशेष रूप से राजनीति में सहिष्णुता की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। राजनीति राष्ट्र का मार्ग निर्धारित करती है; यदि इसमें असहिष्णुता, अपमान, दुराग्रह और द्वेष बढ़ता है, तो समाज में भी यही भाव प्रसारित होते हैं। आज जब राजनीतिक भाषा में कटुता बढ़ रही है, विपक्ष की नकारात्मकता के कारण लोकतांत्रिक संवाद और राजनीतिक संस्कृति दोनों खतरे में पड़ रहे हैं। राजनीति का मूलभूत उद्देश्य जनता की सेवा और राष्ट्र का विकास है, परन्तु यह तभी संभव है जब विचारों की विविधता को सम्मान मिले, विचार-विमर्श की परंपरा जीवित रहे और नेता विरोधी विचारों को भी सुने। श्रेष्ठ नेतृत्व वही है जो सबको साथ लेकर चले, न कि विभाजन और नफरत की सियासत को हवा दे। सहिष्णुता राजनीति को परिपक्वता प्रदान करती है और सत्ता के अहंकार को मानवीय संवेदना से संतुलित करती है।

धर्म के क्षेत्र में भी सहिष्णुता की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि धर्म का मूल स्वरूप शांति, करुणा, प्रेम और सद्भाव है। लेकिन जब धर्म कट्टरता और संकीर्णता का साधन बनने लगता है, जब लोग अपने मत को सर्वाेच्च और दूसरों के मत को नीचा समझने लगते हैं, तब धर्म का वास्तविक उद्देश्य नष्ट हो जाता है। महावीर, बुद्ध, ईसा, पैगंबर, गांधीकृसभी ने धर्म को मन की शुद्धि और मानवता की रक्षा का मार्ग बताया है, न कि विभाजन और संघर्ष का। धर्म का सार यही है कि हम भिन्नताओं को समझें, दूसरों की आस्थाओं का सम्मान करें और मनुष्यता को सर्वाेच्च मानें। धार्मिक सहिष्णुता किसी समाज की आध्यात्मिक ऊँचाई का मापदंड होती है। सह-अस्तित्व की भावना ही वह आधार है जिस पर उन्नत दुनिया का निर्माण संभव है। हम एक ही धरती पर रहते हैं, एक ही मानव समुदाय से जुड़े हैं, और चाहे किसी भी भाषा, धर्म, जाति या संस्कृति से हों, हमारी नियति एक-दूसरे से गुँथी हुई है। यदि हम साथ रहना सीख लें, एक-दूसरे का सम्मान करते हुए आगे बढ़ें, तो दुनिया हिंसा और तनाव से मुक्त होकर सौहार्द और समृद्धि का नया अध्याय लिख सकती है।

दरअसल, बदलते लाइफस्टाइल और सामाजिक माहौल की वजह से लोगों के अंदर सहनशीलता लगातार घटती जा रही है। सामाजिक माहौल ना बिगड़े और लोग एक दूसरे के साथ मिल-जुलकर रहे। व्यक्ति, समाज, राष्ट्र एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई-झगड़ा एवं युद्ध की स्थितियां बनना आम हो गया है। रूस-यूक्रेन एवं इजरायल-हमाम के बीच लम्बे युद्धों ने विश्व मानव समाज के लिये गंभीर खतरे उत्पन्न किये है। लगातार युद्ध की बढ़ती स्थितियां एवं आतंकवाद की बढ़ना व्यक्ति, समाज, राष्ट्र एवं विश्व में बढ़ती असहिष्णुता का ही परिणाम है। किसी भी युग में किसी भी देश में जब-जब सहिष्णुता की दीवार में कोई सुराख करने की कोशिश हुई है, तब-तब आसुरी एवं हिंसक शक्तियों ने सामाजिक एकता को कमजोर किया है और विनाश का तांडव रचा है। सहिष्णुता तभी कायम रह सकती है जब संवाद कायम रहे। सहिष्णुता इमारत है तो संवाद आधार। लेकिन प्रतिस्पर्धा और उपभोक्तावाद के जाल में फंस चुके इस विश्व में यह संवाद लगातार टूटता जा रहा है।

संत कबीरदास से लेकर गुरूनानक, रैदास और आचार्य तुलसी आदि संतों ने समाज में सहिष्णुता का भाव उत्पन्न कर सामाजिक समरसता को जन जन तक पहुंचाया। इससे समाज में सही अर्थों में सहिष्णुता की भावना बलवती हुई। संत कबीर हिन्दु-मुस्लिम एकता के प्रतीक थे। उन्होंने राम-रहीम को एक माना और कहा ईश्वर एक है भले ही उसके नाम अलग-अलग क्यों न हों। आजादी के आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने सहिष्णुता का संदेश घर-घर तक पहुंचाया। गांधीजी सहिष्णुता के साक्षात प्रतीक थे। सहनशीलता हमारे जीवन का मूल मंत्र है। सहिष्णुता ही लोकतंत्र का प्राण है और यही वसुधैव कुटुम्बकम, सर्वे भवन्तु सुखिनः एवं सर्वधर्म सद्भाव का आधार है। इसी से मानवता का अभ्युदय संभव है। अंतर्राष्ट्रीय सहिष्णुता दिवस हमें याद दिलाता है कि मनुष्यता का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि हम कितना स्वीकार करते हैं, कितना समझते हैं और कितनी उदारता से जीते हैं। यह समय की माँग है कि राजनीति में संवाद, धर्म में करुणा और समाज में संवेदना का विस्तार हो। यदि हम सहिष्णुता को विचार नहीं, बल्कि जीवन की शैली बना लें, तो न केवल हमारा व्यक्तिगत जीवन शांतिमय होगा, बल्कि दुनिया भी अधिक सुरक्षित, सुंदर और मानवीय बन जाएगी। यही सहिष्णुता का वास्तविक संदेश है और यही मानवता की सबसे बड़ी आवश्यकता।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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