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गिग-वर्कर्सः डिजिटल सुविधा की चकाचौंध में पसीने का अंधेरा

ऑनलाइन बाज़ार और त्वरित सेवाओं के इस दौर में गिग-वर्कर्स शहरी जीवन-व्यवस्था की वह अदृश्य रीढ़ बन चुके हैं, जिनके बिना ‘दस मिनट में डिलीवरी’ और ‘एक क्लिक पर सुविधा’ की कल्पना भी नहीं की जा सकती। बाज़ार आने-जाने के झंझट से लोगों को मुक्त करने वाले ये युवा हर मौसम, हर समय और हर जोखिम में घर-घर सामान पहुँचाते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जिनके श्रम पर डिजिटल अर्थव्यवस्था की ऊँची इमारत खड़ी है, वही श्रमिक सबसे अधिक असुरक्षा, शोषण और उपेक्षा झेल रहे हैं। नये साल की पूर्व संध्या पर गिग-वर्कर्स द्वारा की गई हड़ताल ने भले ही देशव्यापी आपूर्ति-श्रृंखला को ठप न किया हो, लेकिन इसने उनकी बदहाल कार्य-परिस्थितियों की ओर देश का ध्यान अवश्य खींचा है। यह हड़ताल किसी राजनीतिक उकसावे का परिणाम नहीं, बल्कि लगातार बढ़ते काम के दबाव, घटते मेहनताने, नौकरी की अनिश्चितता और सम्मान के अभाव की स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी।
अपना व परिवार का पोषण करने वाले इन युवा गिग-वर्कर्स को अकसर सरपट दौड़ती मोटरसाइकिलों पर, भारी थैलों के साथ ऊँची इमारतों की सीढ़ियाँ चढ़ते देखा जा सकता है। समय सीमा का दबाव इतना तीव्र होता है कि ज़रा-सी देरी पर आर्थिक दंड झेलना पड़ता है। दुर्घटना, बीमारी या तकनीकी गड़बड़ी-किसी भी स्थिति में उनकी आय पर सीधा असर पड़ता है। ग्राहकों का व्यवहार भी प्रायः असंवेदनशील होता है। देर होने पर झिड़कियाँ, सामान में कमी निकालकर अपमान, कभी-कभी हिंसक व्यवहार और रेटिंग के ज़रिये भविष्य की कमाई पर प्रहार-यह सब इनके रोज़मर्रा का हिस्सा है। इसके बावजूद औसतन 12-14 घंटे काम करने के बाद भी सात-आठ सौ रुपये की आय और वह भी बिना समुचित बीमा या सामाजिक सुरक्षा के एक गहरे शोषण की ओर इशारा करती है।
गिग वर्कर्स  वे लोग होते हैं जो पारंपरिक नौकरी के बजाय अस्थायी, लचीले और स्वतंत्र रूप से छोटे-छोटे काम (गिग्स) करते हैं, जो अक्सर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म जैसे ऊबर, स्वीग्गी, जोमाटोज् या अन्य ऐप्स के ज़रिए मिलते हैं और इन्हें प्रति कार्य या प्रोजेक्ट के हिसाब से भुगतान मिलता है, न कि नियमित वेतन. इन श्रमिकों के पास कोई स्थायी रोजगार अनुबंध नहीं होता और वे खुद के बॉस की तरह काम करते हैं, लेकिन उन्हें सामाजिक सुरक्षा (जैसे स्वास्थ्य बीमा, पेंशन) जैसे लाभ नहीं मिलते। गिग वर्कर्स की चुनौतियाँ एवं मजबूरियां ज्यादा है, आय कम। आय की अनिश्चितता, सामाजिक सुरक्षा लाभों (जैसे बीमारी, दुर्घटना, पेंशन) का अभाव, श्रम अधिक-भुगतान कम, कामकाजी घंटों और मजदूरी को लेकर अक्सर विवाद। गिग वर्कर्स गिग इकॉनमी का हिस्सा हैं, जहाँ वे अपनी मर्ज़ी से छोटे-छोटे, अस्थायी काम करके पैसे कमाते हैं, जो पारंपरिक 9-से-5 की नौकरी से अलग होता है। गिग वर्कर का अर्थ है एक ऐसा व्यक्ति जो आमतौर पर सेवा क्षेत्र में एक स्वतंत्र ठेकेदार या फ्रीलांसर के रूप में अस्थायी काम करता है जो पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंधों के बाहर काम करता है या कार्य व्यवस्था में भाग लेता है और ऐसी गतिविधियों से कमाई करता है।


निस्संदेह, गिग अर्थव्यवस्था ने रोजगार सृजन की अपनी क्षमता दिखाई है। आज भारत में गिग-वर्कर्स की संख्या सवा करोड़ से अधिक है और अनुमान है कि 2030 तक यह संख्या दो करोड़ पैंतीस लाख तक पहुँच सकती है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बेरोजगारी के बढ़ते दौर में पढ़े-लिखे युवा इस व्यवस्था में ‘विकल्प’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘मजबूरी’ में प्रवेश कर रहे हैं। जिस देश को युवाओं का देश कहा जाता है, वहाँ शिक्षित युवाओं का अस्थायी, असुरक्षित और सम्मानहीन श्रम-व्यवस्था में फँसना न केवल चिंताजनक, बल्कि शर्मनाक भी है। यह स्थिति बताती है कि हमारी विकास-नीतियाँ रोजगार की गुणवत्ता पर नहीं, केवल संख्या पर केंद्रित हैं। गिग-वर्कर्स की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि कंपनियाँ उनसे पूरा काम लेती हैं, लेकिन उन्हें पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंध के दायरे में स्वीकार नहीं करतीं। उन्हें ‘स्वतंत्र कामगार’ कहकर नियुक्ति, स्थायित्व, बीमा और न्यूनतम वेतन जैसी जिम्मेदारियों से बचा जाता है।
हायर एंड फायर की नीति, एल्गोरिदम आधारित नियंत्रण, रेटिंग सिस्टम और प्रोत्साहन के नाम पर लालच-ये सब मिलकर एक ऐसी अदृश्य जकड़न पैदा करते हैं, जिसमें श्रमिक स्वतंत्र दिखता है, लेकिन वास्तव में पूरी तरह नियंत्रित होता है। हड़ताल के दौरान भी अतिरिक्त प्रोत्साहन देकर या ऑर्डर बढ़ाकर श्रमिक एकता को कमजोर कर दिया जाता है। 31 दिसंबर को एक प्रमुख खाद्य वितरण कंपनी द्वारा रिकॉर्ड ऑर्डर दर्ज किया जाना इसी विडंबना को उजागर करता है। हाल के दिनों में संसद में भी गिग-वर्कर्स के शोषण का मुद्दा उठा है। सांसद राघव चड्ढा और मनोज कुमार झा जैसे नेताओं ने इस वर्ग की दयनीय स्थिति पर ध्यान दिलाया है। यह स्वागतयोग्य है, क्योंकि नीति-निर्माण की प्रक्रिया में जब तक इन श्रमिकों की आवाज़ शामिल नहीं होगी, तब तक सुधार अधूरे रहेंगे।
भारत सरकार द्वारा हालिया श्रम सुधारों में पहली बार गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को कानूनी रूप से परिभाषित किया गया है। एग्रीगेटर कंपनियों के टर्नओवर का एक से दो प्रतिशत सामाजिक सुरक्षा कोष में योगदान, आधार से जुड़े सार्वभौमिक खाता नंबर जैसी व्यवस्थाएँ एक लंबे समय से प्रतीक्षित कदम हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये प्रावधान वास्तव में गिग-वर्कर्स के जीवन में ठोस बदलाव ला पाएँगे? या फिर ये केवल काग़ज़ी सुधार बनकर रह जाएँगे? जब तक न्यूनतम आय, कार्य-घंटों की सीमा, दुर्घटना बीमा, स्वास्थ्य सुरक्षा और शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित नहीं होती, तब तक इन सुधारों को परिवर्तनकारी नहीं कहा जा सकता।
31 दिसंबर की हड़ताल भले ही पूरी तरह सफल न रही हो, लेकिन वह नैतिक और सामाजिक रूप से पूरी तरह जायज़ थी। यह हड़ताल व्यवस्था को बाधित करने से अधिक, व्यवस्था के भीतर छिपे अन्याय, शोषण की वृत्ति एवं दोगलेपन को उजागर करने का प्रयास थी। गिग-वर्कर्स ने यह संदेश दिया कि वे केवल ‘डिलीवरी बॉय’ नहीं, बल्कि श्रमशील नागरिक हैं, जिनके अधिकारों की अनदेखी अब और नहीं की जा सकती। निश्चित ही डिजिटल अर्थव्यवस्था का भविष्य गिग-वर्कर्स के बिना संभव नहीं है। इसलिए यह ज़रूरी है कि नीति-निर्माता, कंपनियाँ और उपभोक्ता-तीनों अपनी भूमिका पर आत्ममंथन करें। कंपनियों को लाभ के साथ जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी होगी, सरकार को कानूनों का सख्त क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा और उपभोक्ताओं को सुविधा के साथ संवेदनशीलता भी अपनानी होगी। यदि हम गिग-वर्कर्स को केवल सुविधा का साधन मानते रहे और उन्हें सम्मान, सुरक्षा व स्थायित्व नहीं दिया, तो यह केवल श्रमिकों का नहीं, बल्कि हमारी विकास-कल्पना का भी संकट होगा। विकसित भारत, उन्नत भारत एवं समृद्ध भारत के नाम पर एक बदनुमा दाग होगा। डिजिटल भारत की असली परीक्षा यही है कि वह अपने सबसे तेज़ दौड़ने वाले श्रमिकों को कितना सुरक्षित और सम्मानित जीवन दे पाता है।

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तेज़ी से फैलती ऑनलाइन सेवाओं की दुनिया में गिग-वर्कर्स की कार्य-सेवाओं को अब अनौपचारिक नहीं, बल्कि नियोजित, मान्यताप्राप्त और सम्मानजनक श्रम के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। उनकी मेहनत का उचित और सुनिश्चित भुगतान, सुरक्षित कार्य-परिस्थितियाँ और सामाजिक सुरक्षा कोई दया नहीं, बल्कि उनका अधिकार है, जिसमें सरकार को निर्णायक हस्तक्षेप करना ही होगा। मुनाफ़े की अंधी दौड़ में लगी बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों को यह समझना होगा कि श्रम केवल लागत नहीं, बल्कि व्यवस्था की आत्मा है; शोषण की मानसिकता छोड़कर संवेदनशीलता और जवाबदेही अपनाए बिना कोई भी डिजिटल विकास टिकाऊ नहीं हो सकता। यदि गिग-वर्क को गरिमा, सुरक्षा और स्थायित्व के साथ विकसित किया जाए, तो यही सेवाएँ मजबूरी का प्रतीक नहीं, बल्कि रोज़गार की एक आदर्श और मानवीय व्यवस्था बन सकती हैं, जहाँ सुविधा केवल उपभोक्ता को नहीं, सम्मान कामगार को भी मिले।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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