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सॉवरेन एआई से वैश्विक एआई क्रिएटर बनने की ओर भारत का कदम: इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में व्यापक विमर्श

इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 के अंतर्गत आयोजित सत्र ‘स्केलिंग इम्पैक्ट फ्रॉम इंडियाज सॉवरेन एआई एंड डेटा’ में भारत की कृत्रिम बुद्धिमत्ता यात्रा के एक महत्वपूर्ण आयाम पर गहन चर्चा हुई। सत्र का केंद्रीय विषय यह था कि भारत किस प्रकार एआई का केवल उपभोक्ता बने रहने के बजाय वैश्विक महत्व वाले एआई प्रणालियों का सृजनकर्ता बन सकता है।

चर्चा में इस तथ्य को स्वीकार किया गया कि भारत में प्रतिभा और तकनीकी क्षमता उपलब्ध होने के बावजूद गहन अनुसंधान, दीर्घकालिक निवेश और संस्थागत समर्थन में कुछ संरचनात्मक कमियां मौजूद हैं। पैनल ने स्पष्ट किया कि एआई में वास्तविक और स्थायी क्षमता तात्कालिक समाधान से नहीं, बल्कि सुदृढ़ अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र और निरंतर नवाचार निवेश से निर्मित होती है।

वक्ताओं ने एआई संप्रभुता के तीन प्रमुख स्तंभों को रेखांकित किया। पहला, भारतीय भाषाओं और सामाजिक संदर्भों के अनुरूप स्वदेशी एआई मॉडलों का विकास। दूसरा, उच्च गुणवत्ता वाली घरेलू डिजिटल और कंप्यूटेशनल अवसंरचना का निर्माण। तीसरा, मूलभूत और अनुप्रयुक्त अनुसंधान को दीर्घकालिक समर्थन प्रदान करना। यह माना गया कि इन तीनों आयामों के संतुलित विकास से ही भारत वैश्विक एआई परिदृश्य में अपनी स्वतंत्र और प्रभावशाली पहचान स्थापित कर सकेगा।

सत्र में यह भी चर्चा हुई कि उन्नत एआई अनुसंधान को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से जोड़ना अनिवार्य है। वित्तीय समावेशन, कृषि उत्पादकता, स्वास्थ्य सेवा पहुंच, शिक्षा की गुणवत्ता और शासन सुधार जैसे क्षेत्रों में एआई आधारित समाधान विकसित कर ही व्यापक सामाजिक प्रभाव सुनिश्चित किया जा सकता है। वक्ताओं ने कहा कि यदि एआई को भारत के विकास लक्ष्यों के साथ सुव्यवस्थित रूप से संयोजित किया जाए, तो यह समावेशी और टिकाऊ प्रगति का सशक्त माध्यम बन सकता है।

राष्ट्रीय सूचना केंद्र के महानिदेशक और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अपर सचिव श्री अभिषेक सिंह ने अपने विचार रखते हुए कहा कि एआई संप्रभुता का अर्थ वैश्विक सहयोग से अलगाव नहीं है। उनके अनुसार, संप्रभुता का तात्पर्य एआई प्रणालियों के डिजाइन, तैनाती और संचालन पर राष्ट्रीय नियंत्रण स्थापित करना है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एआई का उपयोग स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, कृषि और वित्तीय समावेशन जैसे क्षेत्रों में व्यावहारिक समस्याओं के समाधान के लिए किया जाना चाहिए, ताकि नागरिक अपनी मातृभाषा में सेवाओं का लाभ उठा सकें और जीवन स्तर में सुधार अनुभव कर सकें।

भारतजेन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री ऋषि बाल ने एआई के चरणबद्ध और विवेकपूर्ण कार्यान्वयन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि एआई का विस्तार सभी क्षेत्रों में होगा, परंतु इसकी शुरुआत शासन, नागरिक सेवाओं और वित्त जैसे संवेदनशील क्षेत्रों से सावधानीपूर्वक की जानी चाहिए। उन्होंने एआई विकास को एक निरंतर यात्रा बताया, न कि किसी एक समयबद्ध परियोजना के रूप में। उन्होंने साझा डिजिटल अवसंरचना के निर्माण की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला, जिसमें कॉमन मॉडल, अनुमान संरचना और ऐसे तकनीकी घटक शामिल हों जो नवप्रवर्तकों को सुरक्षित और तीव्र समाधान विकसित करने में सक्षम बनाएं। उनके अनुसार, एआई संप्रभुता के लिए राष्ट्रीय स्तर पर मॉडल और अवसंरचना का एक समेकित इकोसिस्टम आवश्यक है, जो स्टार्टअप और शोध संस्थानों को नवाचार की स्वतंत्रता प्रदान करे।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के सूचना प्रणाली एवं प्रबंधन निदेशालय के निदेशक श्री राजीव रतन चेतवानी ने एआई के रणनीतिक महत्व पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष अवलोकन और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सॉवरेन एआई एक अनिवार्य आवश्यकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि रणनीतिक क्षेत्रों में प्रयुक्त एआई प्रणालियों को इंटरनेट पर प्रत्यक्ष निर्भरता के बिना ऑफलाइन संचालित होने में सक्षम होना चाहिए और उनकी पारदर्शिता तथा लेखापरीक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए। उन्होंने व्याख्यायोग्य मॉडलों, स्पष्ट डेटा वंशक्रम और राष्ट्रीय कानूनी ढांचे के अनुरूप प्रशिक्षण प्रक्रियाओं की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के विशाल भू स्थानिक डेटा संसाधनों का उपयोग एआई के माध्यम से कृषि, आपदा प्रबंधन, जलवायु पूर्वानुमान और शहरी नियोजन को सुदृढ़ करने में किया जा सकता है, जिससे सुरक्षा और सामाजिक दोनों क्षेत्रों में लाभ प्राप्त होंगे।

सत्र के दौरान यह सहमति उभरी कि भारत को एआई के क्षेत्र में दीर्घकालिक क्षमता निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना होगा। केवल तकनीकी समाधान पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि नीति, अनुसंधान संस्थान, उद्योग, स्टार्टअप और निवेश पारिस्थितिकी तंत्र के बीच गहन सहयोग भी आवश्यक है। चर्चा में यह भी स्पष्ट किया गया कि अलग अलग परियोजनाओं के बजाय समन्वित राष्ट्रीय कार्यक्रमों के माध्यम से ही व्यापक और स्थायी प्रभाव सुनिश्चित किया जा सकता है।

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