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बंगाल का भविष्यः धर्म की लहर या प्रगति की राह?

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा भले अभी बाकी हो, पर राजनीतिक रणभेरी बज चुकी है। इस बार संकेत साफ हैं-चुनाव विकास बनाम विकास के दावे पर नहीं, बल्कि पहचान, अस्मिता और धर्म की ध्वजा के इर्द-गिर्द घूम सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर राज्य भर में प्रस्तावित हिंदू सम्मेलनों को भारतीय जनता पार्टी एक वैचारिक उत्सव भर नहीं, बल्कि चुनावी अवसर में बदलने की रणनीति पर आगे बढ़ती दिख रही है। दूसरी ओर ममता बनर्जी ने भी यह समझ लिया है कि यदि चुनाव की जमीन धार्मिक विमर्श पर खिसकती है तो उसे खाली नहीं छोड़ा जा सकता। कोलकाता के न्यू टाउन में ‘दुर्गा आंगन’ का शिलान्यास और उसे बंगाली अस्मिता से जोड़ने का प्रयास इसी रणनीतिक सजगता का हिस्सा है।

बंगाल की राजनीति लंबे समय तक वर्ग-संघर्ष, वाम वैचारिकी और सामाजिक न्याय के नारों के इर्द-गिर्द घूमती रही। लगभग तीन दशक तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेतृत्व में वाम मोर्चा सत्ता में रहा। उससे पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रभुत्व था। किंतु 2011 में सत्ता परिवर्तन के साथ एक नई धुरी बनी-तृणमूल बनाम भाजपा। आज स्थिति यह है कि वाम और कांग्रेस हाशिए पर हैं और मुकाबला दो धू्रवों के बीच सिमट चुका है। यही द्विधू्रवीयता चुनाव को अधिक तीखा और अधिक पहचान-केन्द्रित बना रही है। भाजपा का अभियान चार प्रमुख सूत्रों पर टिका है-बंगाल में हिंदू खतरे में है, बांग्लादेशी घुसपैठ, महिलाओं की असुरक्षा और भ्रष्टाचार। सीमावर्ती जिलों का उदाहरण देकर यह संदेश गढ़ा जा रहा है कि जनसांख्यिकीय संतुलन बदल रहा है। अवैध घुसपैठ का प्रश्न नया नहीं है, पर उसे इस समय राजनीतिक ऊर्जा के साथ जोड़ा जा रहा है। आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज की घटना, शिक्षक भर्ती घोटाले, हिन्दुओं पर बढ़ते अत्याचार एवं भ्रष्टाचार जैसे प्रसंगों को शासन की विफलता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। भाजपा का लक्ष्य स्पष्ट है-70 प्रतिशत हिंदू मतदाताओं में एक साझा असुरक्षा-बोध निर्मित करना, हिन्दुओं को जागृत करना और उसे मतदान व्यवहार में रूपांतरित करना। आज बंगाल में विकास की सबसे बड़ी बाधा घुसपैठियों का बढ़ना है। घुसपैठियों पर विराम लगाना चाहिए न कि इस मुद्दे पर राजनीति हो।
ममता बनर्जी की चुनौती दोहरी है। एक ओर उन्हें यह संदेश देना है कि वे अल्पसंख्यकों की संरक्षक हैं, दूसरी ओर हिंदू मतदाताओं को यह विश्वास भी दिलाना है कि उनकी आस्था और अस्मिता सुरक्षित है। 2021 के चुनाव में जब भाजपा ने ‘जय श्रीराम’ के नारे को आक्रामक रूप से उछाला, तब ममता ने ‘जय मां दुर्गा’ और ‘चंडी पाठ’ के माध्यम से एक सांस्कृतिक प्रत्युत्तर दिया था। इस बार वे दुर्गा आंगन जैसे प्रतीकों के जरिए यह संकेत दे रही हैं कि बंगाली हिंदू पहचान भाजपा की बपौती नहीं है। वे धर्म को राष्ट्रवाद की बजाय क्षेत्रीय अस्मिता के साथ जोड़ती हैं-“बंगाल अपनी संस्कृति से हिंदू है, पर उसकी राजनीति बहुलतावादी है”-यह उनका अंतर्निहित संदेश है। इसी बीच मुर्शिदाबाद में पूर्व तृणमूल नेता हुमायूं कबीर द्वारा ‘बाबरी मस्जिद’ के शिलान्यास की पहल ने नई जटिलता जोड़ दी है। इससे मुस्लिम मतदाताओं के भीतर एक अलग धू्रवीकरण की संभावना पैदा हुई है। यदि मुस्लिम वोटों का बंटवारा होता है, तो तृणमूल का गणित प्रभावित हो सकती है। 2021 में उसे लगभग 48 प्रतिशत वोट और 223 सीटें मिली थीं-जिसमें मुस्लिम मतों का एकमुश्त समर्थन निर्णायक था। भाजपा 38 प्रतिशत वोट के साथ 65 सीटें जीतकर मुख्य विपक्ष बनी। ऐसे में यदि मुस्लिम मत 5-10 प्रतिशत भी इधर-उधर खिसकते हैं, तो कई सीटों का परिणाम बदल सकता है और भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में आ सकती है।

यहां प्रश्न केवल गणित का नहीं, राजनीति के चरित्र का भी है। क्या बंगाल का चुनाव धार्मिक पहचान के उभार का प्रयोगशाला बनेगा? या यह प्रयोग अंततः विकास, रोजगार और बुनियादी ढांचे के प्रश्नों पर लौटेगा? विडंबना यह है कि जिस बंगाल को कभी देश की आर्थिक राजधानी कहा जाता था-जहां से उद्योग, शिक्षा और सांस्कृतिक नवजागरण की रोशनी फैलती थी, वह आज अधूरे प्रोजेक्ट्स, धीमी औद्योगिक गति और रोजगार के पलायन से जूझ रहा है। कोलकाता की सड़कों पर अधूरी मेट्रो लाइनें और बंद कारखानों की चुप्पी विकास की उस कहानी को बयान करती हैं, जो राजनीतिक नारों के शोर में दब जाती है। 2011 में टाटा के नैनो प्रोजेक्ट का राज्य से बाहर जाना एक प्रतीकात्मक मोड़ था। भूमि अधिग्रहण के प्रश्न पर जनसमर्थन पाने वाली राजनीति ने उद्योग के प्रति संशय का वातावरण भी बनाया। पंद्रह वर्षों बाद भी बंगाल बड़े निवेश की प्रतीक्षा में है। युवा रोजगार के लिए बाहर जा रहे हैं, और कई राज्यों में उन्हें ‘बांग्लादेशी’ कहकर अपमानित किए जाने की खबरें आती हैं। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, आत्मसम्मान का प्रश्न भी है। किंतु चुनावी विमर्श में यह पीड़ा गौण हो जाती है, और केंद्र में आ जाता है-धर्म, पहचान और भय।

ममता बनर्जी केंद्र सरकार पर वित्तीय भेदभाव का आरोप लगाती हैं; भाजपा राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार और तुष्टीकरण का। सी.बी.आई. और ई.डी. की कार्रवाइयों को ममता राजनीतिक प्रतिशोध बताती हैं, जबकि भाजपा उन्हें कानून का पालन। इस टकराव ने प्रशासनिक संवाद को भी राजनीतिक संघर्ष में बदल दिया है। परिणाम यह है कि विकास का एजेंडा आरोप-प्रत्यारोप की भेंट चढ़ जाता है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या धर्म-आधारित ध्रूवीकरण स्थायी राजनीतिक समाधान दे सकता है? इतिहास बताता है कि धार्मिक उभार अल्पकालिक ऊर्जा तो देता है, पर दीर्घकालिक शासन-क्षमता की कसौटी पर उसे विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के प्रश्नों से जूझना ही पड़ता है। यदि चुनाव केवल “कौन किसका प्रतिनिधि है” तक सीमित रह गया, तो “कौन क्या करेगा” का प्रश्न अनुत्तरित रह जाएगा।
बंगाल की आत्मा बहुलतावाद में रही है-रामकृष्ण परमहंस से लेकर रवींद्रनाथ तक, यह भूमि विविध आस्थाओं और विचारों का संगम रही है। यहां दुर्गा पूजा और मुहर्रम दोनों सामाजिक उत्सव का रूप लेते रहे हैं। यदि राजनीति इस सामाजिक ताने-बाने को चुनावी अंकगणित में बदल देगी, तो समाज की संवेदनशीलता पर चोट पहुंचेगी। दूसरी ओर, यदि धार्मिक प्रतीकों का उपयोग सांस्कृतिक आत्मगौरव के साथ विकास-प्रतिबद्धता को जोड़ने में किया जाए, तो वह सकारात्मक भी हो सकता है। इस चुनाव में भाजपा की रणनीति हिंदू मतों का अधिकतम ध्रूवीकरण है; ममता की रणनीति हिंदू पहचान को बंगाली अस्मिता के साथ समाहित कर अल्पसंख्यकों के विश्वास को बनाए रखना है। मुस्लिम दलों की सक्रियता तृणमूल के लिए चुनौती है, पर वह भाजपा के लिए अवसर भी है। यह त्रिकोणीय-संभावना चुनाव को जटिल बनाती है। परंतु अंततः लोकतंत्र की परिपक्वता मतदाता तय करता है। यदि बंगाल का मतदाता विकास, रोजगार और सुशासन को प्राथमिकता देता है, तो राजनीतिक दलों को अपना विमर्श बदलना होगा। यदि वह पहचान की राजनीति को स्वीकार करता है, तो वही भविष्य की दिशा बनेगी। प्रश्न केवल यह नहीं कि कौन जीतेगा; प्रश्न यह है कि जीत का एजेंडा क्या होगा?

क्या धर्म के आधार पर लड़ा गया चुनाव सार्थक मूल्य स्थापित कर पाएगा? या यह राज्य को और अधिक वैचारिक खाइयों में धकेल देगा? बंगाल की धरती ने अनेक बार भारत को नई वैचारिक दिशा दी है। आज फिर अवसर है-या तो वह धर्म बनाम धर्म की बहस में उलझे, या धर्म को नैतिकता और विकास की प्रेरणा बनाकर नई राजनीति की राह खोले। चुनाव परिणाम चाहे जो हो, असली कसौटी यही होगी कि क्या बंगाल अपनी आर्थिक ऊर्जा, सांस्कृतिक उदारता और सामाजिक समरसता को पुनः प्राप्त कर पाता है। यदि नहीं, तो धर्म की ध्वजा चाहे जितनी ऊंची फहराई जाए, विकास का शून्य अंततः सबको दिखाई देगा।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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