अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), ऋषिकेश का छठा दीक्षांत समारोह आज गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ, जिसमें भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस अवसर पर केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तथा राज्यपाल गुरमीत सिंह की उपस्थिति ने समारोह की गरिमा को और बढ़ाया। यह आयोजन न केवल शैक्षणिक उपलब्धियों का उत्सव था, बल्कि भारत की उभरती स्वास्थ्य प्रणाली के दृष्टिकोण और दायित्वों का भी गंभीर प्रतिपादन रहा।

समारोह के दौरान उपराष्ट्रपति ने संस्थान की वार्षिक पत्रिका “रुद्राक्ष” का विमोचन किया, जिसमें बीते वर्ष की उपलब्धियों, अनुसंधान प्रगति और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में नवाचारों का व्यापक विवरण प्रस्तुत किया गया है। यह प्रकाशन संस्थान की अकादमिक उत्कृष्टता और रोगी-केंद्रित दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित करता है।
अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने दीक्षांत समारोह को मात्र एक औपचारिकता न मानते हुए इसे जीवन के एक संक्रमण बिंदु के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि यह वह क्षण है जहां शिक्षा से सेवा की ओर यात्रा प्रारंभ होती है, और यह यात्रा जिम्मेदारी, नैतिकता तथा संवेदनशीलता से परिपूर्ण होनी चाहिए। उन्होंने नवस्नातक चिकित्सा पेशेवरों से आग्रह किया कि वे अपने पेशे में उच्चतम नैतिक मानकों का पालन करें और करुणा को अपने कार्य का आधार बनाएं।
कोविड-19 महामारी के संदर्भ में भारत की प्रतिक्रिया का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश की दृढ़ता और संगठनात्मक क्षमता की सराहना की। उन्होंने कहा कि दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण अभियानों में से एक को सफलतापूर्वक लागू करना भारत की स्वास्थ्य प्रणाली की क्षमता और प्रतिबद्धता का प्रमाण है, जिसके अंतर्गत 140 करोड़ से अधिक नागरिकों को निःशुल्क टीकाकरण उपलब्ध कराया गया।
वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने ‘वैक्सीन मैत्री’ पहल का उल्लेख किया, जिसके माध्यम से 100 से अधिक देशों को टीकों की आपूर्ति की गई। उन्होंने इसे “वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना का वास्तविक प्रतिरूप बताते हुए कहा कि भारत ने संकट के समय मानवता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को वैश्विक स्तर पर सिद्ध किया है।
उपराष्ट्रपति ने स्वास्थ्य अवसंरचना के विस्तार में एम्स संस्थानों की भूमिका को विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि देशभर में एम्स नेटवर्क का विस्तार गुणवत्तापूर्ण तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को व्यापक बना रहा है और ये संस्थान चिकित्सा शिक्षा, अनुसंधान तथा नवाचार के समेकित केंद्र के रूप में उभर रहे हैं।
उत्तराखंड की भौगोलिक चुनौतियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने एम्स ऋषिकेश की सराहना की कि किस प्रकार संस्थान ने टेलीमेडिसिन, हेलीकॉप्टर आपात सेवाओं और ड्रोन आधारित दवा वितरण जैसे नवाचारों के माध्यम से दुर्गम क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित की है। चारधाम यात्रा के दौरान ड्रोन द्वारा दवा आपूर्ति और आपातकालीन हेलीकॉप्टर सेवाओं को उन्होंने सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन के प्रभावी उदाहरणों के रूप में प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर केंद्रीय राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने अपने संबोधन में चिकित्सा पेशे की मूलभूत जिम्मेदारियों को रेखांकित करते हुए नवस्नातकों के लिए चार प्रमुख सिद्धांतों का उल्लेख किया—नैतिक आचरण, आजीवन अधिगम, प्रभावी संवाद और सामाजिक उत्तरदायित्व। उन्होंने कहा कि चिकित्सा केवल एक पेशा नहीं, बल्कि मानवता की सेवा का सर्वोच्च माध्यम है, जिसमें विश्वास और पारदर्शिता सर्वोपरि हैं।
उन्होंने स्वास्थ्य क्षेत्र में भारत की प्रगति का उल्लेख करते हुए कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और चिकित्सा शिक्षा का विस्तार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा है। इसके परिणामस्वरूप नागरिकों के जेब से होने वाले स्वास्थ्य व्यय में उल्लेखनीय कमी आई है, जो स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता और वहनीयता की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।
उन्होंने ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण पर भी बल दिया, जो मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य के बीच अंतर्संबंध को स्वीकार करता है और समन्वित नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता को रेखांकित करता है। इसके साथ ही उन्होंने तपेदिक, मलेरिया और एचआईवी/एड्स जैसी चुनौतियों से निपटने में भारत की प्रगति और कोविड-19 टीकाकरण अभियान के दौरान 220 करोड़ से अधिक खुराकों के प्रशासन को महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने संबोधन में नवस्नातकों को बधाई देते हुए कहा कि यह अवसर उनके जीवन में एक नए अध्याय की शुरुआत है। उन्होंने विशेष रूप से उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियों का उल्लेख करते हुए युवाओं से आह्वान किया कि वे दूरस्थ और वंचित क्षेत्रों में सेवा देने के लिए आगे आएं।
समारोह के दौरान विभिन्न संकायों के विद्यार्थियों को उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों के आधार पर डिग्रियां प्रदान की गईं। साथ ही उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्रों को 11 स्वर्ण पदक और पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया गया।
यह दीक्षांत समारोह केवल एक शैक्षणिक पड़ाव नहीं, बल्कि भारत की स्वास्थ्य प्रणाली के भविष्य की दिशा को परिभाषित करने वाला एक महत्वपूर्ण अवसर साबित हुआ, जहां नैतिकता, करुणा और नवाचार को केंद्र में रखकर एक सुदृढ़ और समावेशी स्वास्थ्य व्यवस्था के निर्माण का स्पष्ट संदेश दिया गया।