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प्राचीन जनजातीय आस्था और लोकजीवन का अद्भुत पर्व  “बीदर”

 छत्तीसगढ़ की धरती अपनी लोकसंस्कृति, परंपराओं और जनजातीय आस्थाओं के लिए सदैव विशिष्ट रही है। यहाँ के पर्व-त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति, श्रम, आस्था और सामुदायिक एकजुटता के जीवंत प्रतीक हैं। इन्हीं परंपराओं के मध्य “बीदर” एक ऐसा अनूठा और विशिष्ट जनजातीय पर्व है, जो अपनी संरचना, मान्यताओं और अनुष्ठानों के कारण अन्य सभी त्योहारों से अलग पहचान रखता है।

बीदर पर्व की सबसे खास बात यह है कि यह प्रतिवर्ष नहीं, बल्कि हर तीसरे वर्ष मनाया जाता है। इसका आयोजन भाद्रपद (भादो) मास के शुक्ल पक्ष में किसी भी शुभ दिन किया जा सकता है, इसलिए इसकी तिथि स्थिर नहीं होती। यह लचीला समय निर्धारण इस पर्व की लोकाधारित प्रकृति को दर्शाता है, जहाँ पंचांग से अधिक महत्व सामुदायिक सहमति और परंपरा को दिया जाता है। गांवों में इसकी तैयारी और उत्सव का वातावरण लगभग पंद्रह दिनों तक बना रहता है, जिससे यह केवल एक दिन का अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक सामूहिक आयोजन बन जाता है। बीदर विशेष रूप से किसानों, श्रमिकों और आदिवासी समुदायों का प्रमुख पर्व है, किंतु इसकी व्यापकता यह है कि इसमें सभी वर्गों की सहभागिता होती है।

बीदर के इस पर्व की विशेष खासियत यह भी है कि यह छत्तीसगढ़ के बिलासपुर मंडल (बिलासपुर, मुंगेली, आदि) की आदिम जनजातियों में अच्छी फसल की कामना के लिए ‘बिदरी पूजा’ पर्व जेठ-आषाढ़ माह में बीजों की पूजा के साथ मनाया जाता है। वहीं  (कर्नाटक) में मुख्य रूप से प्रसिद्ध ‘बीदर उत्सव’ मनाया जाता है, जो शहर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का जश्न होता है।

सवर्ण समुदाय द्वारा देवी-देवताओं की पूजा नारियल, धूप और आरती से की जाती है। वहीं अन्य जातीय समूह पारंपरिक विधि से पशुबलि (मुख्यतः बकरे की बलि) के माध्यम से पूजा-अर्चना करते हैं।इस प्रकार बीदर सामाजिक विविधता के बीच सांस्कृतिक एकता का उदाहरण प्रस्तुत करता है।

बीदर पर्व का सबसे चर्चित और संवेदनशील पक्ष है – पशुबलि की परंपरा।गांव में सर्वप्रथम कुर्मी समुदाय द्वारा बकरे की बलि दी जाती है, जो ग्राम देवता “ठाकुर देव” को समर्पित होती है। इसके बाद अन्य समुदाय भी इसी क्रम का पालन करते हैं।

इस अनुष्ठान में बैगा (पारंपरिक पुजारी/ओझा) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वह बलि के पश्चात बकरे के रक्त से पहले देवता को अर्पित करता है,फिर यजमान (वाचक) के मस्तक पर रक्त तिलक लगाकर उसकी कुशलता की कामना करता है। यह परंपरा आधुनिक दृष्टि से भले विवादास्पद प्रतीत हो, किंतु जनजातीय मान्यताओं में यह त्याग, समर्पण और देवताओं को प्रसन्न करने का प्रतीक है। इसे गांव की रक्षा, समृद्धि और संतुलन के लिए आवश्यक माना जाता है।

बीदर पर्व केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि यह पूरे गांव के जीवन को एक अनुशासन में बांध देता है-पूजा से पहले पानी भरना और भोजन करना वर्जित होता है।गांव से बाहर जाना निषिद्ध माना जाता है।सम्पूर्ण ग्राम एक साथ पूजा सम्पन्न होने की प्रतीक्षा करता है। यह सामूहिक अनुशासन ग्राम-जीवन में एकता और अनुशासन की भावना को सुदृढ़ करता है।

इस पर्व की सूचना ग्राम प्रमुख द्वारा कोटवार के माध्यम से मुनादी कर दी जाती है। यह परंपरागत सूचना प्रणाली आज भी ग्रामीण संस्कृति में जीवित है, जो आधुनिक संचार माध्यमों के अभाव में भी सामुदायिक समन्वय को बनाए रखती है।

यदि बीदर के बाद भी गांव में कोई प्राकृतिक आपदा, बीमारी या अनिष्ट घटित होता है, तो इसे पूजा में त्रुटि या देवताओं की अप्रसन्नता माना जाता है। ऐसी स्थिति में क्वांर (आश्विन) मास के शुक्ल पक्ष में पुनः पूजा-अर्चना कर देवताओं को प्रसन्न करने की परंपरा निभाई जाती है।यह विश्वास दर्शाता है कि जनजातीय समाज प्रकृति और आध्यात्मिक शक्तियों के साथ अपने संबंध को कितना गंभीरता से लेता है।

बीदर केवल एक पर्व नहीं, बल्कि यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, सामूहिक सुरक्षा की कामना,आर्थिक-सामाजिक संरचना का प्रतिबिंब, और जनजातीय दर्शन का सजीव रूप है।यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि आधुनिकता की दौड़ में भी परंपराओं का अपना महत्व है, क्योंकि वे समाज को उसकी जड़ों से जोड़े रखती हैं।

आज के समय में, जब पशुबलि जैसी परंपराओं पर नैतिक और कानूनी बहस होती है, तब आवश्यक है कि इन परंपराओं को संवेदनशीलता और समझ के साथ देखा जाए,जनजातीय समाज के विश्वासों का सम्मान करते हुए धीरे-धीरे मानवीय और पर्यावरण-संतुलित विकल्पों की ओर संवाद स्थापित किया जाए।

बीदर पर्व छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति का एक ऐसा दर्पण है, जिसमें आस्था, परंपरा, अनुशासन और सामूहिकता के रंग स्पष्ट झलकते हैं। यह हमें यह सोचने पर भी विवश करता है कि विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण कितना आवश्यक है। बीदर न केवल एक उत्सव है, बल्कि यह उस लोकजीवन की कहानी है, जहाँ हर अनुष्ठान के पीछे एक गहरी भावना और हर परंपरा के पीछे एक सामूहिक अनुभव छिपा हुआ है।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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