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मां सा कोई न दूजा जग में…

मां है ईश्वर का सबसे
 प्यारा सुंदर अवतार।
जीवन के इस उपवन में,
मां ही है फूलों की बहार।

मां  का  अद्भुत  रूप  सलोना,
कृपासिंधु परमेश्वर जैसा।
प्रेम के सागर सा लहराता
मां का अपनापन ऐसा।

मां ही धरती, मां ही जगत है,
मां ही धुरी है घर की।
मां के बिना कल्पना अधूरी
इस पूरी सृष्टि की।

त्याग, तपस्या,सेवा है मां,
मां ही है मंत्रों का जाप।
जीवन की रागिनी में मां ही
है रागों का मधुर आलाप।

मन के अंधकार में मां ही
है सूरज का उजाला।
जीवन की कड़वाहट में, मां ही
है अमृत का प्याला।

मां का आंचल सब खुशियों की
रंगारंग फुलवारी।
मां ही सींचती है इस जग में
हर जीवन की क्यारी !!!

स्मृति श्रीवास्तव
स्मृति श्रीवास्तव, लेखक के बारे में : स्मृति श्रीवास्तव का तृतीय काव्य संग्रह  डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित “अन्तर्ध्वनि” समकालीन हिंदी काव्यधारा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में उभरता है। हिंदी साहित्य में एम.ए. उपाधि प्राप्त करने के उपरांत लेखिका ने अपना जीवन हिंदी भाषा, भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संवर्धन को समर्पित किया है। नई दिल्ली के सेंट थॉमस स्कूल में दो दशकों तक हिंदी एवं संस्कृत का अध्यापन, दिल्ली विश्वविद्यालय के नेत्रहीन विद्यार्थियों के लिए दुर्लभ ग्रंथों का वाचन-रिकॉर्डिंग तथा वंचित महिलाओं के लिए सामाजिक सक्रियता—इन सभी अनुभवों की गहन मानवीय संवेदना इस कृति की पंक्तियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।
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