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नेत्रदान: अंधकार से प्रकाश की ओर सबसे बड़ा सेतु


विश्व नेत्रदान दिवस (10 जून, 2026) पर विशेषः

मानव जीवन में आंखों का महत्व केवल देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे हमारी चेतना, संवेदना, ज्ञान और जीवन के सौंदर्य का द्वार हैं। आंखों के माध्यम से ही हम प्रकृति की विविधता, परिवार का स्नेह, समाज की गतिविधियों और संसार की अनंत संभावनाओं का अनुभव करते हैं। इसलिए दृष्टि का अभाव केवल शारीरिक अक्षमता नहीं, बल्कि जीवन के अनेक आयामों से वंचित हो जाने की पीड़ा है। ऐसे में नेत्रदान केवल एक चिकित्सकीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि किसी अंधेरे जीवन में प्रकाश भरने वाला महान मानवीय और आध्यात्मिक उपक्रम है। प्रतिवर्ष 10 जून को मनाया जाने वाला ‘विश्व नेत्रदान दिवस’ हमें यह स्मरण कराता है कि मृत्यु के बाद भी हमारा अस्तित्व किसी अन्य व्यक्ति के जीवन में रोशनी बनकर जीवित रह सकता है। यह दिवस केवल जागरूकता का अवसर नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना, सामाजिक उत्तरदायित्व और परोपकार की संस्कृति को सशक्त करने का अभियान है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में करोड़ों लोग दृष्टिबाधिता और अंधता से प्रभावित हैं। भारत में भी लाखों लोग कॉर्निया संबंधी रोगों के कारण दृष्टि खो चुके हैं। विशेष चिंता की बात यह है कि कॉर्निया की खराबी से होने वाली अंधता के अनेक मामलों का उपचार संभव है, किंतु पर्याप्त नेत्रदान न होने के कारण लाखों मरीज वर्षों तक प्रतीक्षा सूची में बने रहते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार कॉर्निया प्रत्यारोपण चिकित्सा विज्ञान की सबसे सफल प्रत्यारोपण प्रक्रियाओं में से एक है, जिसकी सफलता दर 95 से 98 प्रतिशत तक मानी जाती है। इसके बावजूद देश में आवश्यकता की तुलना में उपलब्ध कॉर्निया की संख्या बहुत कम है। हर वर्ष लाखों लोगों को कॉर्निया की जरूरत होती है, लेकिन दान की संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम रहती है। यह स्थिति बताती है कि समस्या चिकित्सा संसाधनों की नहीं, बल्कि जागरूकता और सामाजिक संकल्प की है।

भारतीय संस्कृति में दान को धर्म का आधार माना गया है। अन्नदान भूख मिटाता है, वस्त्रदान शरीर को ढंकता है, धनदान आर्थिक सहायता देता है, किंतु नेत्रदान किसी व्यक्ति को जीवन का नया अनुभव प्रदान करता है। इसीलिए इसे महादान या जीवनदान की श्रेणी में रखा गया है। जब कोई व्यक्ति मृत्यु के बाद अपनी आंखें दान करता है, तब वह केवल एक अंग नहीं देता, बल्कि किसी अंधे व्यक्ति को संसार देखने का अवसर प्रदान करता है। वह किसी बच्चे को शिक्षा का मार्ग, किसी युवा को रोजगार की संभावना और किसी वृद्ध को आत्मनिर्भरता की शक्ति देता है। यह दान ऐसा है जिसमें दाता को कोई हानि नहीं होती, लेकिन प्राप्तकर्ता का संपूर्ण जीवन बदल जाता है। भारतीय परंपरा में महर्षि दधीचि का उदाहरण त्याग और देहदान की सर्वोच्च मिसाल माना जाता है। उन्होंने लोककल्याण के लिए अपना शरीर समर्पित किया था। नेत्रदान उसी परंपरा की आधुनिक अभिव्यक्ति है। यह मृत्यु के बाद भी मानवता की सेवा का अवसर प्रदान करता है। वास्तव में नेत्रदान वह पुण्य है जिसमें दाता का शरीर समाप्त हो जाता है, किंतु उसकी दृष्टि किसी और के जीवन में प्रकाश बनकर जीवित रहती है।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने नेत्रदान की उपयोगिता को और अधिक व्यापक बना दिया है। पहले एक दाता की दोनों आंखों से केवल दो व्यक्तियों को लाभ मिलता था, किंतु नई तकनीकों के माध्यम से एक कॉर्निया के विभिन्न भागों का उपयोग करके अधिक लोगों की सहायता संभव हो रही है। आज एक नेत्रदाता कई व्यक्तियों के जीवन में प्रकाश ला सकता है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि नेत्रदान के लिए किसी विशेष आयु की आवश्यकता नहीं होती। 80 या 90 वर्ष की आयु वाले व्यक्ति की आंखें भी उपयोगी हो सकती हैं। चश्मा पहनने वाले, मधुमेह या उच्च रक्तचाप से पीड़ित व्यक्ति भी अधिकांश स्थितियों में नेत्रदान कर सकते हैं। यह भ्रांति कि केवल पूर्णतः स्वस्थ व्यक्ति ही नेत्रदान कर सकते हैं, पूरी तरह गलत है। मृत्यु के बाद 4 से 6 घंटे के भीतर कॉर्निया सुरक्षित निकाल लिया जाता है और पूरी प्रक्रिया अत्यंत सम्मानपूर्वक संपन्न होती है। इससे मृतक के चेहरे की बनावट में कोई विकृति नहीं आती और अंतिम संस्कार में भी कोई बाधा नहीं होती।

नेत्रदान को बढ़ावा देने में सबसे बड़ी बाधा सामाजिक मिथक और अंधविश्वास हैं। अनेक लोग मानते हैं कि नेत्रदान करने से मृत शरीर विकृत हो जाता है या अगले जन्म में आंखें नहीं मिलेंगी। कुछ लोग यह भी सोचते हैं कि वृद्ध व्यक्तियों अथवा चश्मा पहनने वालों की आंखें उपयोगी नहीं होतीं। चिकित्सा विज्ञान ने इन धारणाओं को पूरी तरह निराधार सिद्ध कर दिया है। आवश्यकता इस बात की है कि समाज वैज्ञानिक तथ्यों को स्वीकार करे और अंधविश्वासों से मुक्त होकर मानवता के इस महान अभियान से जुड़े। नेत्रहीनता केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक चुनौती भी है। दृष्टिबाधिता व्यक्ति की शिक्षा, रोजगार और आत्मनिर्भरता को प्रभावित करती है। इससे परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ता है और समाज की उत्पादक क्षमता भी घटती है। विभिन्न अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि दृष्टिबाधिता के कारण देश को प्रतिवर्ष अरबों रुपये की आर्थिक क्षति होती है। यदि कॉर्निया अंधता से पीड़ित लोगों को समय पर प्रत्यारोपण उपलब्ध हो जाए, तो वे पुनः शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन में सक्रिय भागीदारी कर सकते हैं। इस प्रकार नेत्रदान केवल मानवीय सेवा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का भी माध्यम है।

सभी प्रमुख धर्म मानव सेवा को सर्वोच्च धर्म मानते हैं। किसी भी धर्मग्रंथ में नेत्रदान या अंगदान का निषेध नहीं है। इसके विपरीत, परोपकार, दया और करुणा को आध्यात्मिक उन्नति का आधार बताया गया है। जब कोई व्यक्ति मृत्यु के बाद अपने नेत्र दान करता है, तो वह यह संदेश देता है कि जीवन केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी जिया जाना चाहिए। यह भावना व्यक्ति को संकीर्ण स्वार्थ से ऊपर उठाकर व्यापक मानवता से जोड़ती है। वास्तव में नेत्रदान ईश्वर की सृष्टि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक श्रेष्ठ माध्यम है। आज आवश्यकता है कि नेत्रदान को केवल एक स्वास्थ्य कार्यक्रम न मानकर सामाजिक एवं नैतिक आंदोलन के रूप में देखा जाए। परिवारों में इस विषय पर खुलकर चर्चा हो, युवाओं को इसके प्रति प्रेरित किया जाए और प्रत्येक नागरिक मृत्यु के उपरांत नेत्रदान का संकल्प ले। यदि समाज का एक बड़ा वर्ग इस दिशा में आगे आता है तो देश में कॉर्निया अंधता की समस्या को काफी हद तक समाप्त किया जा सकता है।

नेत्रदान को जन-आंदोलन बनाने में विभिन्न सामाजिक संगठनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। विशेष रूप से ‘लायन्स क्लब नई दिल्ली अलकनंदा’ तथा ‘लायन्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए-1’ ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। विगत कई दशकों से इन संस्थाओं द्वारा नेत्रदान जागरूकता अभियान, नेत्रदान संकल्प-पत्र भरवाने, नेत्र चिकित्सा शिविरों के आयोजन तथा आई बैंकों के साथ समन्वय स्थापित करने जैसे अनेक रचनात्मक कार्य किए जा रहे हैं। लायन्स इंटरनेशनल का वैश्विक सेवा अभियान ‘साइट फर्स्ट’ दृष्टि संरक्षण एवं अंधत्व निवारण की दिशा में विश्व का सबसे बड़ा स्वैच्छिक कार्यक्रम माना जाता है। इस अभियान के माध्यम से लाखों लोगों को नेत्र चिकित्सा सेवाएं, मोतियाबिंद ऑपरेशन, दृष्टि परीक्षण तथा नेत्रदान के प्रति जागरूकता प्रदान की गई है। ‘लायन्स क्लब नई दिल्ली अलकनंदा’ भी इसी भावना के साथ निरंतर समाज में यह संदेश प्रसारित कर रहा है कि मृत्यु के बाद नेत्रदान करके हम किसी अंधेरी जिंदगी में स्थायी उजाला भर सकते हैं। यह सेवा केवल सामाजिक कार्य नहीं, बल्कि करुणा, संवेदना और मानवता का जीवंत उदाहरण है।

नेत्रदान मृत्यु के बाद जीवन की निरंतरता का सबसे सुंदर प्रतीक है। यह वह दान है जो किसी अंधे व्यक्ति के जीवन में केवल प्रकाश ही नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, सम्मान, अवसर और नई आशा भी लाता है। यह विज्ञान, करुणा और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम है। विश्व नेत्रदान दिवस हमें यह संदेश देता है कि मनुष्य का वास्तविक मूल्य उसके संचित धन में नहीं, बल्कि उसके द्वारा किए गए लोककल्याण में है। यदि हमारी मृत्यु के बाद हमारी आंखें किसी की दुनिया रोशन कर सकती हैं, तो इससे बड़ा पुण्य, इससे बड़ी सेवा और इससे बड़ी मानवता की साधना शायद कोई नहीं हो सकती। आइए, हम संकल्प लें कि जीवन की अंतिम यात्रा के बाद भी हमारी आंखें किसी और के सपनों को देखने का माध्यम बनें। हमारा नेत्रदान किसी अंधेरी जिंदगी में सूर्योदय बनकर उभरे, यही ‘विश्व नेत्रदान दिवस’ की सार्थकता है, यही सच्चा धर्म है और यही मानवता का उज्ज्वल भविष्य है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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