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मोदी युग के बारह वर्ष: विकास, विश्वास और विराट का उदय

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में कुछ कालखंड केवल शासन परिवर्तन के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण के लिए याद किए जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते बारह वर्षों का दौर ऐसा ही एक कालखंड है। यह केवल एक प्रधानमंत्री के लंबे कार्यकाल की कहानी नहीं है, बल्कि उस भारत की कहानी है जिसने स्वयं को नए आत्मविश्वास, नई ऊर्जा और नई वैश्विक पहचान के साथ स्वयं को स्थापित किया है। नरेंद्र मोदी ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेकर स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के लगातार सबसे लंबे समय तक निर्वाचित प्रधानमंत्री रहने के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया। यह उपलब्धि केवल राजनीतिक सफलता नहीं है, बल्कि जनता के उस विश्वास का प्रमाण है जो बार-बार लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से व्यक्त हुआ है। भारत जैसा विशाल, बहुभाषी, बहुधार्मिक और सांस्कृतिक विविधताओं से भरा देश किसी नेतृत्व को लगातार तीन बार राष्ट्रीय जनादेश दे, यह अपने आप में असाधारण एवं ऐतिहासिक घटना है।

मोदी युग की सबसे बड़ी विशेषता केवल विकास नहीं, बल्कि विकास और विश्वास का समन्वय है। नेहरू युग को आधुनिक भारत के निर्माण का काल कहा गया, तो मोदी युग को उस भारत के आत्मविश्वास के पुनर्जागरण का काल कहा जा सकता है। मोदी ने केवल सड़कों, पुलों, हवाई अड्डों और डिजिटल नेटवर्क का निर्माण नहीं किया, बल्कि करोड़ों भारतीयों के मन में यह विश्वास भी जगाया कि भारत किसी से कम नहीं है और वह विश्व मंच पर नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकता है। मोदी की सबसे विलक्षण विशेषता यह रही कि उन्होंने राजनीति को केवल सत्ता संचालन का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे जनभावनाओं और राष्ट्रीय आकांक्षाओं से जोड़ा। वे उन विरले नेताओं में हैं जिन्होंने सरकारी योजनाओं को केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं रहने दिया, बल्कि उन्हें जनआंदोलन का स्वरूप दिया। स्वच्छ भारत अभियान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सफाई का विषय जो कभी सरकारी विभागों तक सीमित था, उसे राष्ट्रीय चरित्र और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ दिया गया।

मोदी युग को भारत की गुम होती सांस्कृतिक अस्मिता की पुनर्स्थापना के लिए भी याद किया जाएगा। सदियों से उपेक्षित राष्ट्रीय प्रतीकों, तीर्थस्थलों और सांस्कृतिक विरासत को नई गरिमा मिली। अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण केवल एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की सांस्कृतिक चेतना के सम्मान का प्रतीक बना। काशी विश्वनाथ धाम, महाकाल लोक, केदारनाथ पुनर्निर्माण और सोमनाथ जैसे तीर्थों का विकास यह संकेत देता है कि आधुनिकता और परंपरा एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकती हैं। मोदी की एक और विशेषता यह है कि उन्होंने भारत की विदेश नीति को आत्मविश्वास का नया आयाम दिया। कभी विश्व शक्तियों के बीच संतुलन साधने वाला भारत आज वैश्विक विमर्श को प्रभावित करने वाला राष्ट्र बनकर उभरा है। रूस-यूक्रेन युद्ध हो, पश्चिम एशिया का संकट हो, जी-20 का नेतृत्व हो अथवा वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) की आवाज उठाने का प्रश्न- भारत ने निर्णायक भूमिका निभाई है। यह वही भारत है जिसे कभी विकासशील देशों की कतार में खड़ा माना जाता था, लेकिन आज दुनिया उसकी ओर समाधान प्रदाता राष्ट्र के रूप में देख रही है।
इन बारह वर्षों की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह भी है कि शासन के केंद्र में पहली बार अंतिम व्यक्ति को रखने का गंभीर प्रयास दिखाई दिया। जनधन योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत, पीएम आवास योजना, मुफ्त राशन योजना तथा प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी योजनाओं ने करोड़ों गरीबों के जीवन में बदलाव लाने का काम किया। शासन की पारदर्शिता बढ़ी और बिचौलियों की भूमिका सीमित हुई। डिजिटल इंडिया अभियान ने तकनीक को केवल महानगरों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि गांव-गांव तक पहुंचाया। नरेंद्र मोदी की नेतृत्व शैली का एक विशिष्ट पक्ष उनका संकल्पबोध है। वे बड़े लक्ष्य निर्धारित करते हैं और उन्हें राष्ट्रीय अभियान का स्वरूप देते हैं। चाहे 370 का उन्मूलन हो, तीन तलाक पर रोक हो, जीएसटी लागू करना हो, महिला आरक्षण विधेयक हो अथवा नक्सलवाद और आतंकवाद के विरुद्ध कठोर नीति-इन सभी निर्णयों में राजनीतिक जोखिम था, लेकिन उन्होंने जोखिम उठाने का साहस दिखाया। यही साहस उन्हें सामान्य राजनेताओं से अलग करता है।

हालांकि, किसी भी लोकतांत्रिक शासन की तरह चुनौतियां भी कम नहीं हैं। बेरोजगारी, महंगाई, कृषि संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य की बढ़ती लागत, सामाजिक विषमताएं तथा आर्थिक अवसरों का असमान वितरण ऐसे प्रश्न हैं जिनका समाधान अभी अपेक्षित है। भारत यदि 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य प्राप्त करना चाहता है तो केवल आर्थिक वृद्धि पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ चिकित्सा, रोजगार सृजन और भ्रष्टाचारमुक्त प्रशासन को भी समान प्राथमिकता देनी होगी। मोदी सरकार के आगामी वर्षों से सबसे बड़ी अपेक्षा यही है कि वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपने अभियान को और अधिक प्रभावी बनाए। भारत को ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जहां ईमानदारी अपवाद नहीं, सामान्य व्यवहार बने। शिक्षा और स्वास्थ्य को व्यावसायिक माफियाओं के प्रभाव से मुक्त कर आम नागरिक की पहुंच में लाना भी समय की मांग है। साथ ही उद्यमिता को बड़े औद्योगिक घरानों तक सीमित रखने के बजाय गांवों, युवाओं और महिलाओं तक पहुंचाना होगा ताकि प्रत्येक नागरिक रोजगार खोजने वाला नहीं, बल्कि रोजगार देने वाला बन सके।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुझे अनेक अवसरों पर मिलने और उन्हें निकट से देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वर्ष 2007 में, जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब गुजरात के आदिवासी अंचल कवांट में पूज्य आदिवासी जैन संत गणि राजेंद्र विजयजी के सान्निध्य में आयोजित एक विराट आदिवासी सम्मेलन में उनसे विस्तृत संवाद का अवसर मिला। उस सम्मेलन में वे केवल औपचारिक अतिथि के रूप में नहीं आए थे, बल्कि अपने संपूर्ण मंत्रिमंडल के साथ उपस्थित होकर आदिवासी समाज के विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का परिचय दिया था। उसी अवसर पर उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों के शैक्षिक उत्थान हेतु एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय को हमारे सुखी परिवार फाउंडेशन को संचालित करने के लिए प्रदान किया तथा आदिवासी विकास की दिशा में ऐतिहासिक 15,000 करोड़ रुपये की वनबंधु कल्याण योजना की घोषणा की। यह उनकी दूरदृष्टि और समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने की सोच का प्रमाण था। इसी सम्मेलन के दौरान एक अत्यंत रोचक और ऐतिहासिक प्रसंग भी सामने आया। गणि राजेंद्र विजयजी ने नरेंद्र मोदी से कहा-“अब आपको दिल्ली जाना चाहिए और देश की बागडोर संभालनी चाहिए।” उस समय मोदीजी ने सहज मुस्कान के साथ उत्तर दिया-“मुझे दिल्ली कौन ले जाएगा?” किंतु संतों की वाणी में एक विशेष शक्ति होती है। जो बात उस समय एक साधारण संवाद प्रतीत हुई, वही कुछ वर्षों बाद भविष्यवाणी के रूप में सत्य सिद्ध हुई।

उन दिनों गुजरात सचिवालय में भी अनेक बार जाने और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने का अवसर मिला। वहां जो सबसे अधिक प्रभावित करने वाली बात थी, वह उनकी कार्यसंस्कृति का प्रभाव था। सचिवालय में बड़े से बड़े आईएएस अधिकारी भी आत्मानुशासन, समयपालन और स्वावलंबन का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते थे। अपने छोटे-छोटे कार्य स्वयं करना, अनावश्यक तामझाम से दूर रहना, समय का सदुपयोग करना और जिम्मेदारी को सर्वोपरि मानना वहां की प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा बन चुका था। स्पष्ट महसूस होता था कि यह कार्यशैली शीर्ष नेतृत्व की प्रेरणा से विकसित हुई है। नरेंद्र मोदी केवल आदेश देने वाले प्रशासक नहीं हैं, बल्कि अपने आचरण से व्यवस्था को दिशा देने वाले नेतृत्वकर्ता हैं। भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी है। यदि इस ऊर्जा को कौशल, नवाचार और उद्यमिता से जोड़ा गया तो भारत केवल विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सकता है। इसी प्रकार महिला शक्ति को विकास की मुख्यधारा में पूर्ण भागीदारी देकर राष्ट्र निर्माण की गति को कई गुना बढ़ाया जा सकता है। मोदी युग की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद आंकड़ों, परियोजनाओं या चुनावी जीतों में नहीं, बल्कि उस मनोवैज्ञानिक परिवर्तन में है जो भारत के जनमानस में दिखाई देता है। नरेंद्र मोदी ने बारह वर्षों में विकास की संरचनाएं खड़ी की हैं, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने करोड़ों भारतीयों के भीतर भविष्य के भारत की एक आकांक्षा जगाई है। 2047 के विकसित भारत का उनका संकल्प तभी साकार होगा जब विकास के साथ विश्वास, समृद्धि के साथ समान अवसर और शक्ति के साथ संवेदनशीलता भी जुड़ेगी। यदि यह संतुलन बना रहता है, तो इतिहास मोदी युग को केवल एक लंबे राजनीतिक कार्यकाल के रूप में नहीं, बल्कि भारत के आत्मविश्वास, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और वैश्विक उदय के युग के रूप में याद करेगा।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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