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 एक युग का अवसान, एक विरासत का अमरत्व

राजस्थानी संस्कृति के अमर साधक के. सी. मालू

कुछ व्यक्तित्व केवल अपने जीवनकाल तक सीमित नहीं रहते, वे अपने समय की सांस्कृतिक चेतना बन जाते हैं। उनके जाने के बाद भी उनकी साधना समाज की स्मृतियों, संस्कारों और परंपराओं में जीवित रहती है। राजस्थानी लोकसंगीत, भाषा, साहित्य और संस्कृति के ऐसे ही युगपुरुष थे केसरी चंद (के.सी.) मालू। उनका निधन केवल एक व्यक्ति का निधन नहीं है, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक यात्रा के एक स्वर्णिम अध्याय का विराम है। उन्होंने अपने जीवन को जिस निष्ठा, समर्पण और तपस्वी भाव से राजस्थानी अस्मिता के संरक्षण में समर्पित किया, वह उन्हें सामान्य व्यक्तियों की श्रेणी से बहुत ऊपर स्थापित करता है। आज जब बाजारवाद और वैश्वीकरण की तेज आंधी में लोकसंस्कृतियां अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं, तब के. सी. मालू जैसे व्यक्तित्वों का महत्व और भी बढ़ जाता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि यदि संकल्प दृढ़ हो तो एक अकेला व्यक्ति भी पूरी सांस्कृतिक धरोहर को विलुप्त होने से बचा सकता है। उन्होंने राजस्थानी लोकधुनों एवं लोकगीतों को केवल संग्रहित नहीं किया, बल्कि उन्हें नई पीढ़ी की धड़कनों तक पहुंचाया। उन्होंने संस्कृति को संग्रहालय की वस्तु नहीं बनने दिया, बल्कि उसे जनजीवन की सांसों से जोड़ दिया। निश्चित ही वे लोकधुनों के सजग प्रहरी थे, संस्कृतिप्रेमी एवं कला-साधक थे।
संगीत उनके लिए केवल मनोरंजन नहीं था, बल्कि संस्कृति का प्राण था। उन्होंने हजारों लोकगीतों की पांडुलिपियां तैयार करवाईं, ध्वनिलिपियां बनवाईं, उनकी रिकॉर्डिंग करवाई और उन्हें सुरक्षित रखा। बिना किसी सरकारी सहायता के पांच हजार से अधिक लोकगीतों का संरक्षण अपने आप में विश्वस्तरीय सांस्कृतिक साधना है। यह कार्य किसी संस्थान के लिए भी कठिन माना जाता है, लेकिन उन्होंने इसे अपने जीवन का मिशन बना लिया। यही कारण है कि आज राजस्थान की अनेक लोकधुनें, विवाह गीत, मांड, पणिहारी, घूमर, चिरमी और असंख्य लोकगाथाएं सुरक्षित हैं। वीणा म्यूजिक की स्थापना केवल एक व्यावसायिक संस्था की स्थापना नहीं थी, बल्कि यह राजस्थान की आत्मा को स्वर देने का अभियान था। उस दौर में जब लोककलाकार गुमनामी के अंधेरे में खो रहे थे, उन्होंने उन्हें मंच दिया, सम्मान दिया और पहचान दी। अनेक कलाकार, जिनकी प्रतिभा गांवों तक सीमित थी, उनके प्रयासों से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचे। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि लोककला किसी क्षेत्र की सीमाओं में कैद नहीं होती, बल्कि वह पूरी मानवता की सांस्कृतिक धरोहर होती है। ऐसा प्रतीत होता है उनके जीवन की हर पात में संगीत की झंकार है। राजस्थानी संस्कृति, संगीत एवं लोकधुनों से जहां-जहां साक्षात्कार होगा, वहां-वहां के.सी. मालू के कदमों के निशान मिलेंगे। उनका मन एवं कर्म सृजनात्मक था।

के.सी. मालू की दृष्टि केवल संगीत तक सीमित नहीं थी। वे राजस्थानी भाषा के भी प्रखर प्रहरी थे। उनका मानना था कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह किसी समाज की आत्मा और उसकी सांस्कृतिक स्मृति होती है। राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिलाने के लिए उन्होंने जो संघर्ष किया, वह उनके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एवं अपनी माटी के प्रति समर्पण का प्रमाण है। उन्होंने देश और विदेश के अनेक मंचों पर राजस्थानी भाषा की गरिमा और उसकी समृद्ध साहित्यिक परंपरा को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचकर भी विनम्र बने रहे। उनके भीतर कलाकार का संवेदनशील हृदय, साहित्यकार की दृष्टि और समाजसेवी की आत्मीयता एक साथ दिखाई देती थी। वे जानते थे कि संस्कृति केवल पुस्तकों या मंचों से जीवित नहीं रहती, बल्कि लोगों के जीवन में उतरने से जीवित रहती है। इसलिए उन्होंने लोकसंगीत को गांवों से निकालकर शहरों तक और भारत से निकालकर विश्वभर के राजस्थानी समाज तक पहुंचाया।

वर्ष 1987 में अकाल पीड़ितों की सहायता के लिए लता मंगेशकर नाइट का आयोजन कर एक करोड़ रुपये की सहायता राशि जुटाना उनके सामाजिक दायित्वबोध का अद्भुत उदाहरण है। यह बताता है कि उनके लिए संगीत केवल कला नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम भी था। उन्होंने अपने संसाधनों और प्रतिष्ठा का उपयोग समाजहित के लिए किया। आज जब कला का बड़ा हिस्सा केवल व्यवसाय बनता जा रहा है, तब के.सी. मालू का जीवन यह संदेश देता है कि कला का सर्वोच्च उद्देश्य समाज को समृद्ध बनाना है। उनके द्वारा संकलित 221 राजस्थानी विवाह गीतों का विशाल संग्रह विश्व में अपनी तरह का अनूठा उदाहरण है। यह केवल गीतों का संग्रह नहीं, बल्कि राजस्थान की सामाजिक परंपराओं, पारिवारिक संस्कारों और सांस्कृतिक स्मृतियों का जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने यह समझ लिया था कि यदि लोकगीत बचेंगे तो लोकजीवन भी बचेगा। इसलिए उन्होंने संगीत के माध्यम से संस्कृति की रक्षा का महान कार्य किया।

मेरा उनसे संबंध केवल एक प्रशंसक का नहीं था, बल्कि आत्मीयता का था। मेरे पूज्य पिताजी स्व. श्री रामस्वरूप जी गर्ग जब भी जयपुर जाते थे, तो के.सी. मालू जी से अवश्य मिलते थे। दोनों के बीच साहित्य, संस्कृति, जैन दर्शन और समाज के विविध विषयों पर लंबी चर्चाएं होती थीं। उन चर्चाओं का उल्लेख मैं बचपन से सुनता आया हूं। उन संवादों में केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं होता था, बल्कि संस्कृति के भविष्य की चिंता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का भाव भी दिखाई देता था। बाद में मुझे भी उनसे मिलने और उनके स्नेह का लाभ लेने का अवसर मिला। उनकी सहजता, आत्मीयता और विचारों की गहराई आज भी स्मृतियों में ताजा है। वे जब भी राजस्थान की संस्कृति की बात करते थे, उनके शब्दों में केवल जानकारी नहीं होती थी, बल्कि मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम झलकता था। वे मानते थे कि अपनी जड़ों से जुड़ा समाज ही भविष्य का निर्माण कर सकता है। शायद यही कारण था कि उन्होंने आधुनिक तकनीक को अपनाते हुए भी परंपरा को कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने डिजिटल माध्यमों पर भी राजस्थानी संगीत को स्थापित किया, जिससे दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाला राजस्थानी अपनी मिट्टी की सुगंध को महसूस कर सके।

आप एक सेतु बन सकते हैं खूबसूरत, जिन्दगी बांचने वाला एवं संस्कृति-संरक्षण करने वाला पुल। हम एक साथ मिलकर जीवन को संस्कृतिमय बना सकते हैं, जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर कर सकते हैं, अंधेरों के बीच रोशनी बन सकते हैं। इसी सोच के साथ ‘वीणा’ के संस्थापक के. सी. मालू का जीवन हमें यह भी सिखाता है कि महानता पद, सत्ता या संपत्ति से नहीं आती, बल्कि उस विरासत से आती है जो व्यक्ति समाज को देकर जाता है। उन्होंने अपने पीछे न केवल हजारों गीतों का खजाना छोड़ा है, बल्कि असंख्य कलाकारों की मुस्कान, लाखों श्रोताओं की स्मृतियां और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का एक अमूल्य स्रोत भी छोड़ा है। यही किसी भी जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है। आज उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए मन बार-बार यही कहता है कि कुछ लोग शरीर से विदा होते हैं, किंतु अपने कार्यों के कारण कभी विदा नहीं होते। के. सी. मालू भी ऐसे ही अमर व्यक्तित्व हैं। जब भी राजस्थान की धरती पर घूमर की थाप गूंजेगी, मांड की मधुर स्वर-लहरियां बहेंगी, विवाह गीतों में लोकसंस्कृति का उल्लास झलकेगा, तब-तब उनकी साधना स्मरण की जाएगी। वे हर उस स्वर में जीवित रहेंगे, जिसमें राजस्थान की माटी की सुगंध होगी।

मालू का जीवन एक संदेश है कि संस्कृति का संरक्षण किसी सरकार का नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक सजग व्यक्ति का दायित्व है। यदि एक व्यक्ति संकल्प ले ले तो वह पूरी पीढ़ियों की सांस्कृतिक स्मृति को सुरक्षित रख सकता है। के.सी. मालू ने यही करके दिखाया। इसलिए उनका जाना केवल एक रिक्तता नहीं, बल्कि एक ऐसी जिम्मेदारी छोड़ गया है जिसे समाज को मिलकर निभाना होगा। ईश्वर से प्रार्थना है कि वे पुण्यात्मा के. सी. मालू को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा उनके परिजनों, असंख्य शुभचिंतकों और समस्त कला-जगत को इस अपूरणीय क्षति को सहन करने की शक्ति प्रदान करें। उनके द्वारा प्रज्वलित संस्कृति, संगीत और भाषा का यह दीपक आने वाली पीढ़ियों को सदैव आलोकित करता रहेगा। यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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