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बाल-जीवन की धड़कनों को स्वर देती कविताएँ : ‘नींद हुआ मैं तुमसे गुस्सा’

हिंदी बालसाहित्य में ऐसी रचनाओं का विशेष महत्व है, जो बच्चों की दुनिया को उनकी अपनी दृष्टि से समझते हुए सहज, सरस और कल्पनाशील अभिव्यक्ति प्रदान करें। बालक के मन की जिज्ञासाओं, उसकी कल्पना, संवेदनाओं, खेल, प्रश्नों और अनुभवों को यदि कविता स्वाभाविक ढंग से स्वर देती है, तभी वह बालसाहित्य की कसौटी पर खरी उतरती है। इसी दृष्टि से योगेन्द्र प्रताप मौर्य का बाल कविता-संग्रह ‘नींद हुआ मैं तुमसे गुस्सा’ एक उल्लेखनीय और सार्थक कृति के रूप में सामने आता है। फ्लाई ड्रीम्स पब्लिकेशंस, दिल्ली से प्रकाशित इस संग्रह में कुल 31 बाल कविताएँ संकलित हैं। इन कविताओं में बालमन की जिज्ञासा, चंचलता, कल्पनाशीलता, हास्य-बोध, प्रकृति-प्रेम, पारिवारिक आत्मीयता, सामाजिक सरोकार तथा समकालीन जीवन की विविध स्थितियों का प्रभावशाली चित्रण मिलता है।

संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी कविताएँ बच्चों के दैनिक जीवन और उनके अनुभवों से सीधे जुड़ती हैं। कवि ने बच्चों के आसपास की सामान्य वस्तुओं, घटनाओं और परिस्थितियों को इस प्रकार कविता का विषय बनाया है कि वे उनके लिए आत्मीय और रोचक बन जाती हैं। मनोरंजन के साथ-साथ जीवन-मूल्यों, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, श्रम की प्रतिष्ठा, पारिवारिक संबंधों तथा मानवीय संवेदनाओं का संदेश भी इन कविताओं में सहज रूप से समाहित है। कहीं भी उपदेशात्मकता का बोझ नहीं है; बल्कि संदेश कविता के स्वाभाविक प्रवाह में घुल-मिलकर पाठक तक पहुँचता है।

संग्रह की प्रमुख कविताओं में- मैं पंखे का भाई, रील बनाते हैं, टॉमी और अजगर, झाड़ू भाई, कॉलोनी की सत्ता, कंचे हँसते और हँसाते, पेड़ नारियल पात हिलाता, नींद हुआ मैं तुमसे गुस्सा, महँगे स्कूलों में, शहरी बाबू, दादाजी की छड़ी कमाल, महल और झोपड़ी, पापा मेरा दम घुटता है, बारिश बहुत लुभाती है, तब पकते गेहूँ के दाने, बैठा हूँ मैं टॉयलेट में तथा चिड़ियाँ आईं रहने जैसी उल्लेखनीय रचनाएँ सम्मिलित हैं। इन कविताओं के माध्यम से कवि ने बालजीवन के अनेक रंगों को अत्यंत सहजता और आत्मीयता के साथ अभिव्यक्त किया है।

संग्रह की अत्यंत आकर्षक कविता ‘मैं पंखे का भाई’ बाल-कल्पना और मानवीकरण का सुंदर उदाहरण है। कविता की पंक्तियाँ देखें-

“कूलर भाई कूलर भाई,

तुम हो कितने प्यारे,

गरमी जी को दिखलाते हो,

आखिर कैसे तारे ?

केवल पंखे से मुश्किल है,

गरमी दूर भगाना।

बिना तुम्हारे कब संभव है बोलो,

राहत पाना।

कूलर बोला-मुझे देखकर,

गरमी है घबराई।

पंखा मेरा ही भाई है,

मैं पंखे का भाई।”

इन पंक्तियों में कूलर और पंखे का मानवीकरण अत्यंत स्वाभाविक और मनोरंजक बन पड़ा है। बालक की सहज जिज्ञासा के उत्तर में कूलर स्वयं को पंखे का भाई बताता है। यह संवाद बच्चों की कल्पनाशक्ति को विस्तार देता है और उनके आसपास की वस्तुओं के प्रति आत्मीयता विकसित करता है।

संग्रह की एक अन्य महत्वपूर्ण कविता ‘रील बनाते हैं’ समकालीन जीवन की यथार्थपरक अभिव्यक्ति है। कविता की पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-

“गेम खेलते और वीडियो,

रील बनाते हैं।

फेसबुक, इंस्टा, ट्विटर पर हम

लाइव आते हैं।

अपनी पीढ़ी आज हमारी,

बात कहाँ माने।

आभासी दुनिया को केवल,

ये अपना जाने।”

डिजिटल युग में बच्चों की बदलती जीवनशैली तथा सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को कवि ने अत्यंत सहजता से चित्रित किया है। यह कविता केवल तकनीक के उपयोग का चित्रण नहीं करती, बल्कि उसके अतिरेक से उत्पन्न मानसिक दूरी और आभासी दुनिया के आकर्षण की ओर भी संकेत करती है। विशेष बात यह है कि कवि कहीं भी उपदेशात्मक नहीं होता, बल्कि बालजीवन के यथार्थ को सामने रखकर पाठक को स्वयं सोचने का अवसर देता है। इस दृष्टि से यह कविता बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों और शिक्षकों के लिए भी समान रूप से प्रासंगिक बन जाती है।

संग्रह की शीर्षक कविता ‘नींद हुआ मैं तुमसे गुस्सा’ बालमन की सहज मनोवैज्ञानिक अभिव्यक्ति है। कविता की पंक्तियाँ देखें-

“नींद हुआ मैं तुमसे गुस्सा,

तुमने सारा काम बिगाड़ा।

आ जाती हो रोज रात में,

कर पाऊँ कब याद पहाड़ा ?

थक जाऊँ जब पढ़ते-पढ़ते,

तब आकर तुम मुझे सुलाना।

नहीं तुम्हें फिर मैं रोकूँगा,

बातें मेरी नहीं भुलाना।”

इन पंक्तियों में नींद का मानवीकरण अत्यंत प्रभावशाली ढंग से हुआ है। पढ़ाई और विश्राम के बीच झूलते बालमन की शिकायत, उसकी मासूम नाराज़गी और अंततः सहज समझौते का भाव कविता को अत्यंत आत्मीय बना देता है। यह कविता बालमनोविज्ञान की सूक्ष्म समझ का परिचायक है तथा बच्चों के स्वाभाविक अनुभवों को अत्यंत विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत करती है।

संग्रह की अत्यंत मार्मिक कविता ‘महँगे स्कूलों में’ सामाजिक विषमता और शिक्षा में अवसरों की असमानता को संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त करती है। कविता की पंक्तियाँ देखें-

“पापा हैं मजदूर कहाँ से,

इतने पैसे लाएँ।

महँगी कॉपी और किताबें,

देख-देख घबराएँ।

धनवानों के बच्चे पढ़ते,

महँगे स्कूलों में।

खूब खेलते मस्ती करते,

बैठे ही झूलों में।

मन करता है इनके जैसे,

मैं भी करुँ पढ़ाई।

किंतु बहुत मुश्किल है ऐसा,

इतनी नहीं कमाई।”

इन पंक्तियों में एक श्रमिक परिवार के बच्चे की आकांक्षाओं और विवशताओं का अत्यंत संवेदनशील चित्र उपस्थित हुआ है। कवि ने आर्थिक विषमता को किसी वैचारिक आग्रह के बजाय बालक की सहज अनुभूति के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। यही कारण है कि कविता पाठक के मन में गहरी संवेदना जगाती है तथा समान शैक्षिक अवसरों की आवश्यकता का संकेत करती है।

संग्रह की कविता ‘तांडव खूब मचाया’ भीषण गर्मी के प्रभाव का अत्यंत सजीव और बालसुलभ चित्र प्रस्तुत करती है। कविता की पंक्तियाँ देखें-

“बेल मिली क्या इस गरमी ने,

तांडव खूब मचाया।

बच्चे, बूढ़े, बड़े, सयाने,

हर कोई घबराया।

सुबह, दोपहर, शाम पसीना,

बदलें कितने कपड़े।

गर्म हवा के झोंके भी तो,

कितने मोटे-तगड़े।”

इन पंक्तियों में कवि ने गर्मी की तीव्रता को बालसुलभ भाषा और कल्पना के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है। लू, पसीने और तपती धूप से होने वाली असुविधा को बच्चे जिस रूप में अनुभव करते हैं, वही अनुभव कविता में सजीव होकर सामने आता है।

‘दादाजी की छड़ी कमाल’ संग्रह की अत्यंत आत्मीय, कल्पनाशील और भावपूर्ण कविता है। कविता की पंक्तियाँ देखें-

“रंग चढ़ा है हल्का-लाल,

दादाजी की छड़ी कमाल !

धूप लगे जब दादाजी को,

छतरी-सी खुल जाती है।

चलते-चलते जब वे थकते,

तब कुर्सी बन जाती है।

ऐसे रखती रोज ख्याल,

दादाजी की छड़ी कमाल!”

इन पंक्तियों में कवि ने बाल-कल्पना को अत्यंत सहज रूप में प्रस्तुत किया है। बच्चे की दृष्टि में दादाजी की साधारण-सी छड़ी कभी छतरी तो कभी कुर्सी का रूप धारण कर लेती है। यह कल्पना केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि परिवार के प्रति आत्मीयता, बड़ों के प्रति सम्मान तथा पीढ़ियों के बीच भावनात्मक संबंधों को भी सशक्त बनाती है।

प्रकृति के प्रति बालमन के आकर्षण का अत्यंत मनोहारी चित्र ‘बारिश बहुत लुभाती है’ कविता में मिलता है। कविता की पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-

“मम्मी मुझको बारिश,

बहुत लुभाती है।

नहीं नहाते पेड़,

इन्हें नहलाती है।

बादल चित्र बनाता,

और मिटाता है।

कितने कौशल रोज़ मुझे,

दिखलाता है।

इतनी सारी खुशियाँ,

लेकर आती है।”

इन पंक्तियों में वर्षा के प्रति बालक का सहज आकर्षण अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त हुआ है। पेड़ों को नहलाती वर्षा और आकाश में चित्र बनाते बादलों की कल्पना कविता को सौंदर्य और नवीनता प्रदान करती है। कवि प्रकृति को केवल दृश्य रूप में प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि उसके साथ बच्चे का आत्मीय संबंध भी स्थापित करता है।

इस संग्रह की अधिकांश कविताएँ बच्चों के अनुभव-जगत से गहरे जुड़ी हुई हैं। कवि ने दैनिक जीवन की सामान्य वस्तुओं, घटनाओं और परिस्थितियों को रचनात्मक कल्पना के सहारे नया अर्थ प्रदान किया है। यही कारण है कि संग्रह की कविताएँ बच्चों को अपनी दुनिया का स्वाभाविक विस्तार प्रतीत होती हैं। बालमनोविज्ञान की गहरी समझ इस संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति है। कवि बच्चों के लिए नहीं, बल्कि बच्चों की दृष्टि से कविता लिखता है, और यही विशेषता इन रचनाओं को विश्वसनीय तथा प्रभावशाली बनाती है।

प्रकृति भी इस संग्रह का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। खेत, पेड़, पक्षी, बादल, वर्षा, ऋतुएँ और ग्रामीण परिवेश से जुड़ी अनेक कविताएँ बच्चों को प्रकृति के निकट ले जाती हैं। इन रचनाओं में पर्यावरण संरक्षण का संदेश किसी उपदेश के रूप में नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आत्मीयता और संवेदनशीलता के रूप में व्यक्त हुआ है। यही कारण है कि ये कविताएँ बच्चों में पर्यावरण के प्रति सहज अनुराग उत्पन्न करती हैं।

संग्रह का सामाजिक पक्ष भी विशेष उल्लेखनीय है। आर्थिक विषमता, श्रम की गरिमा, पारिवारिक आत्मीयता, सामाजिक समरसता, सहानुभूति तथा मानवीय मूल्यों जैसे विषयों को कवि ने सरल और सहज भाषा में प्रस्तुत किया है। वह बच्चों को समाज की वास्तविकताओं से परिचित तो कराता है, किंतु कहीं भी उनकी सहजता और निष्कपटता को आहत नहीं होने देता। यही संतुलन इस संग्रह की एक बड़ी उपलब्धि है।

यद्यपि कुछ विषय हिंदी बाल कविता की परंपरा में पहले भी व्यक्त होते रहे हैं, फिर भी योगेन्द्र प्रताप मौर्य की प्रस्तुति उन्हें नवीनता और ताजगी प्रदान करती है। उनकी दृष्टि समकालीन जीवन से जुड़ी हुई है। वे डिजिटल संस्कृति, बदलती जीवनशैली, शिक्षा, परिवार, प्रकृति और सामाजिक सरोकारों को बालमनोविज्ञान के अनुरूप अभिव्यक्त करते हैं। यही कारण है कि संग्रह मनोरंजन के साथ-साथ विचार और संवेदना का भी प्रभाव छोड़ता है।

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि ‘नींद हुआ मैं तुमसे गुस्सा’ बालसुलभ संवेदनाओं, कल्पनाशीलता, प्रकृति-प्रेम, सामाजिक चेतना तथा जीवन-मूल्यों का सशक्त काव्य-संग्रह है। इसकी कविताएँ बच्चों का स्वस्थ मनोरंजन करने के साथ-साथ उनके भाव-जगत को समृद्ध बनाती हैं। यह संग्रह केवल बाल पाठकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अभिभावकों, शिक्षकों तथा बालसाहित्य के अध्येताओं के लिए भी समान रूप से उपयोगी सिद्ध होता है।

किताब : नींद हुआ मैं तुमसे गुस्सा (बाल कविता-संग्रह)

कवि : योगेन्द्र प्रताप मौर्य

डॉ. उमेशचन्द्र सिरसवारी
डॉ. उमेशचन्द्र सिरसवारी
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