अंतहीन रजनी के तिमिर में
नन्हीं दीपशिखा है प्रज्ज्वलित।
अभिलाषाओं की चिंगारी
गहन अंधेरे में भी दीपित।
तम का विदारक सूक्ष्म प्रकाश
हृदय पटल पर नव उल्लास।
रात्रि का मौन करता है विकल
पर यह प्रकाश रहता अविचल।
छोटी सी लौ मन के तमस में
भी है कर्म का मार्ग दिखाती।
सतत है जलती,बुझती नहीं ये
चेतना का आवाहन करती।
जब नव ऊर्जा का होता उदय
तब निरीहता का होता क्षय।
कुछ कर गुजरने की चाहत में
अंतर का तम हो जाता विलय।
पथ की विघ्न बाधाओं का
निर्भयता से करें सामना।
मन में जलती चिंगारी देती
सपनों को जीने की प्रेरणा !!!

लेखक के बारे में : स्मृति श्रीवास्तव का तृतीय काव्य संग्रह डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित “अन्तर्ध्वनि” समकालीन हिंदी काव्यधारा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में उभरता है। हिंदी साहित्य में एम.ए. उपाधि प्राप्त करने के उपरांत लेखिका ने अपना जीवन हिंदी भाषा, भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संवर्धन को समर्पित किया है। नई दिल्ली के सेंट थॉमस स्कूल में दो दशकों तक हिंदी एवं संस्कृत का अध्यापन, दिल्ली विश्वविद्यालय के नेत्रहीन विद्यार्थियों के लिए दुर्लभ ग्रंथों का वाचन-रिकॉर्डिंग तथा वंचित महिलाओं के लिए सामाजिक सक्रियता—इन सभी अनुभवों की गहन मानवीय संवेदना इस कृति की पंक्तियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।

