भारत की सांस्कृतिक चेतना में कुछ स्थल ऐसे हैं, जहाँ प्रकृति, पुरातत्व, धर्म, इतिहास और पर्यावरण एक साथ साकार रूप में दिखाई देते हैं। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा में ( कुछ हिस्सा छत्तीसगढ़ में में और कुछ अनूपपुर जिले में ) स्थित अमरकंटक ऐसा ही एक दिव्य तीर्थ है। विंध्य, सतपुड़ा और मैकल पर्वतमालाओं के संगम पर स्थित अमरकंटक को “तीर्थराज” तथा “नदियों की जननी” कहा जाता है। यहीं से भारत की जीवनदायिनी माँ नर्मदा, सोन नदी तथा जोहिला नदी का उद्गम होता है।
अमरकंटक केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि प्राचीन ऋषि-मुनियों की तपोभूमि, कलचुरीकालीन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण, दुर्लभ औषधीय वनस्पतियों का भंडार तथा जैव-विविधता का अमूल्य केंद्र भी है।



अमरकंटक का ऐतिहासिक एवं पौराणिक महत्व
‘अमरकंटक’ का अर्थ है.. देवताओं का शिखर। स्कन्दपुराण, मत्स्यपुराण, मार्कण्डेय पुराण तथा रेवाखण्ड में इसका विस्तृत उल्लेख मिलता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार देवताओं ने यहीं यज्ञ कर माँ नर्मदा को पृथ्वी पर अवतरित किया। महर्षि कपिल, मार्कण्डेय, भृगु, अगस्त्य, दुर्वासा सहित अनेक ऋषियों ने यहाँ कठोर तप किया। इसलिए इसे भारत की प्राचीन तपोभूमियों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।
माँ नर्मदा उद्गम मंदिर
अमरकंटक का सबसे पवित्र स्थल नर्मदा उद्गम कुंड है। यहीं स्थित भव्य मंदिर में माँ नर्मदा की पूजा होती है। नर्मदा भारत की एकमात्र ऐसी प्रमुख नदी है जिसकी परिक्रमा का विशेष धार्मिक विधान है। लगभग 3500 किलोमीटर लंबी नर्मदा परिक्रमा आज भी हजारों साधु-संत एवं श्रद्धालु पैदल पूरी करते हैं। नर्मदा को केवल नदी नहीं बल्कि “जीवंत देवी” माना गया है।
इन्द्रदमन सरोवर एवं पंच सरोवर
यहां अवस्थित शिलालेख के अनुसार इन्द्रदमन सरोवर अमरकंटक के पंच सरोवरों में विशेष स्थान रखता है। कथा के अनुसार इन्द्रदेव ने अपने अहंकार का दमन यहीं किया था, इसलिए इसका नाम इन्द्रदमन कुंड पड़ा।अमरकंटक के पंच सरोवर आध्यात्मिक साधना, ध्यान और तपस्या के प्रमुख केंद्र रहे हैं। इनके आसपास आज भी अनेक प्राचीन अवशेष एवं धार्मिक संरचनाएँ विद्यमान हैं।




सोनमुड़ा : सोन नदी का उद्गम
अमरकंटक का दूसरा अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ सोनमुड़ा है। यहीं से भारत की प्रमुख नदियों में से एक सोन नदी का उद्गम होता है। यह आगे चलकर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, झारखंड और बिहार की जीवनरेखा बनती हुई गंगा में मिलती है। सोनमुड़ा से मैकल पर्वत एवं घने जंगलों का मनोरम दृश्य अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य प्रस्तुत करता है।
कलचुरीकालीन पातालेश्वर मंदिर
अमरकंटक में स्थित प्राचीन पातालेश्वर महादेव मंदिर कलचुरीकालीन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है।लगभग 10वीं–11वीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर विशाल पत्थरों की उत्कृष्ट नक्काशी, स्थापत्य संतुलन तथा धार्मिक महत्व के कारण भारतीय पुरातत्व का महत्वपूर्ण धरोहर है। यह मंदिर इस तथ्य का प्रमाण है कि अमरकंटक मध्यकालीन भारतीय संस्कृति का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
कपिलधारा एवं दूधधारा जलप्रपात
नर्मदा उद्गम से आगे बढ़ने पर सबसे पहले कपिलधारा जलप्रपात आता है।मान्यता है कि महर्षि कपिल ने यहीं तपस्या की थी। लगभग 100 फीट की ऊँचाई से गिरती नर्मदा की जलधारा अत्यंत मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करती है।इसके कुछ आगे स्थित दूधधारा जलप्रपात अपनी दुग्धवत श्वेत जलधारा के कारण प्रसिद्ध है। वर्षा ऋतु में इसका प्राकृतिक सौंदर्य अद्वितीय हो उठता है।
मैकल पर्वतमाला एवं जैव-विविधता
अमरकंटक का संपूर्ण क्षेत्र मैकल पर्वतमाला का महत्वपूर्ण भाग है। यह क्षेत्र भारत के सर्वाधिक समृद्ध औषधीय वन क्षेत्रों में गिना जाता है।यहाँ पाई जाने वाली अनेक दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ आयुर्वेद एवं पारंपरिक चिकित्सा में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यहाँ मिलने वाली अनेक वनस्पतियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं जिनके संरक्षण की आवश्यकता है।
ऋषियों की तपोभूमि
अमरकंटक केवल तीर्थ नहीं बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा का जीवंत विश्वविद्यालय रहा है। कपिल, मार्कण्डेय, दुर्वासा, भृगु, अगस्त्य, व्यास तथा अनेक सिद्ध योगियों ने यहाँ साधना की। आज भी अनेक आश्रम, गौशालाएँ, वेद विद्यालय एवं सनातन परंपरा के केंद्र यहाँ सक्रिय हैं।
पर्यावरणीय महत्व
अमरकंटक का वन क्षेत्र मध्य भारत की जल सुरक्षा का आधार है। यहीं से निकलने वाली नदियाँ करोड़ों लोगों को पेयजल, सिंचाई तथा आजीविका उपलब्ध कराती हैं। वनों के अंधाधुंध कटाव, पर्यटन जनित प्रदूषण तथा अतिक्रमण इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी के लिए गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं।
संरक्षण की आवश्यकता
अमरकंटक केवल धार्मिक स्थल नहीं बल्कि राष्ट्रीय धरोहर है। इसके संरक्षण हेतु प्राचीन मंदिरों का वैज्ञानिक संरक्षण। औषधीय वनस्पतियों का संरक्षण। जल स्रोतों की स्वच्छता। नियंत्रित एवं पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन।स्थानीय जनजातीय ज्ञान का संरक्षण। पुरातात्विक धरोहरों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण। जैसे उपाय अत्यंत आवश्यक हैं।
अमरकंटक भारतीय संस्कृति की उस महान परंपरा का प्रतीक है जहाँ प्रकृति और अध्यात्म एक-दूसरे के पूरक हैं। नर्मदा उद्गम, सोनमुड़ा, इन्द्रदमन सरोवर, पंच सरोवर, कलचुरीकालीन पातालेश्वर मंदिर, कपिलधारा, दूधधारा तथा मैकल पर्वतमाला की दुर्लभ जैव-विविधता मिलकर इसे विश्वस्तरीय प्राकृतिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत बनाते हैं। आज आवश्यकता है कि अमरकंटक को केवल तीर्थ या पर्यटन स्थल न मानकर भारतीय सभ्यता के जीवंत अभिलेख के रूप में संरक्षित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इसकी आध्यात्मिक गरिमा, प्राकृतिक समृद्धि और ऐतिहासिक वैभव का अनुभव कर सकें।
