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पारिस्थितिकीय संतुलन और जैव विविधता के लिए अत्यंत आवश्यक बाघ

29 जुलाई : राष्ट्रीय बाघ संरक्षण दिवस पर विशेष

प्रकृति ने पृथ्वी पर प्रत्येक जीव को एक विशेष उद्देश्य और भूमिका के साथ निर्मित किया है। वन्यजीवों की इस विशाल दुनिया में बाघ एक ऐसा अद्भुत और शक्तिशाली प्राणी है, जो केवल जंगल का राजा ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य और संतुलन का प्रहरी भी है। यही कारण है कि प्रतिवर्ष 29 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस तथा भारत में बाघ संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

बाघ पृथ्वी पर मौजूद सबसे महत्वपूर्ण शीर्ष परभक्षियों में से एक है। खाद्य श्रृंखला के शीर्ष पर स्थित होने के कारण यह जंगल में रहने वाले शाकाहारी जीवों जैसे हिरण, सांभर, नीलगाय और जंगली सूअर की संख्या को नियंत्रित करता है। यदि इन जीवों की आबादी अनियंत्रित हो जाए तो वनस्पतियों का अत्यधिक दोहन होगा और जंगलों का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाएगा। इस प्रकार बाघ अप्रत्यक्ष रूप से वनों, जलस्रोतों और संपूर्ण जैव विविधता की रक्षा करता है।

वन्यजीव वैज्ञानिकों का मानना है कि किसी भी जंगल में बाघ की उपस्थिति उस पारिस्थितिकी तंत्र के स्वस्थ होने का प्रमाण है। जिस वन क्षेत्र में बाघ सुरक्षित हैं, वहां वनस्पतियां, जलस्रोत, शाकाहारी जीव और अन्य वन्य प्रजातियां भी सुरक्षित रहती हैं। इसलिए बाघ को “छत्र प्रजाति”  और “संकेतक प्रजाति” भी कहा जाता है। यदि किसी पारिस्थितिक तंत्र से बाघ विलुप्त हो जाएं तो उसका प्रभाव केवल एक प्रजाति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी खाद्य श्रृंखला और जैव विविधता पर पड़ता है। प्रकृति में प्रत्येक जीव एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। किसी एक महत्वपूर्ण प्रजाति के लुप्त होने से पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता प्रभावित होती है। इसलिए बाघों का संरक्षण केवल एक वन्यजीव को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि सम्पूर्ण प्राकृतिक व्यवस्था को सुरक्षित रखने का संकल्प है।

भारत के लिए बाघ का महत्व और भी विशेष है। बाघ भारत का राष्ट्रीय पशु है और भारतीय संस्कृति, लोककथाओं, साहित्य तथा धार्मिक परंपराओं में उसका महत्वपूर्ण स्थान है। देवी दुर्गा का वाहन बाघ माना गया है, जो शक्ति, साहस और संरक्षण का प्रतीक है। भारतीय कला, मूर्तिकला और लोकजीवन में भी बाघ की छवि सदियों से प्रतिष्ठित रही है।

विश्व स्तर पर बाघों की संख्या में पिछले एक शताब्दी के दौरान चिंताजनक गिरावट दर्ज की गई है। कभी लाखों की संख्या में पाए जाने वाले बाघ आज सीमित क्षेत्रों तक सिमट गए हैं। इसका प्रमुख कारण वनों की कटाई, प्राकृतिक आवासों का विनाश, अवैध शिकार, वन्यजीव तस्करी, बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप तथा जलवायु परिवर्तन है। बाघों की खाल, हड्डियों और अन्य अंगों की अवैध तस्करी भी उनके अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बनी हुई है।

भारत ने बाघ संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है। वर्ष 1973 में प्रारंभ की गई “प्रोजेक्ट टाइगर” योजना ने बाघ संरक्षण को नई दिशा प्रदान की। इसके अंतर्गत देशभर में अनेक बाघ अभयारण्य और टाइगर रिजर्व स्थापित किए गए। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) तथा भारतीय वन्यजीव संस्थान के सहयोग से नियमित अंतराल पर बाघों की गणना की जाती है। आधुनिक कैमरा ट्रैप, जीपीएस तकनीक और वैज्ञानिक सर्वेक्षणों के माध्यम से उनकी निगरानी की जाती है।

आज भारत विश्व में सर्वाधिक बाघों वाला देश है। यह उपलब्धि न केवल संरक्षण प्रयासों की सफलता को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि जनसहभागिता, वैज्ञानिक प्रबंधन और राजनीतिक इच्छाशक्ति के माध्यम से वन्यजीव संरक्षण को प्रभावी बनाया जा सकता है।

बाघ संरक्षण का एक महत्वपूर्ण आर्थिक पक्ष भी है। देश के अनेक राष्ट्रीय उद्यान और टाइगर रिजर्व पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, जिससे पर्यावरण पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। इस प्रकार बाघ केवल जंगलों की रक्षा ही नहीं करते, बल्कि स्थानीय समुदायों के जीवनयापन में भी योगदान देते हैं।

वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, बढ़ते शहरीकरण और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के कारण वन्यजीवों के अस्तित्व पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। ऐसे समय में बाघों का संरक्षण मानवता की साझा जिम्मेदारी बन जाता है। हमें वनों की रक्षा, वन्यजीव अपराधों पर रोक, पर्यावरण शिक्षा के प्रसार और जैव विविधता संरक्षण के प्रयासों को मजबूत करना होगा। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण दिवस हमें यह संदेश देता है कि प्रकृति और मानव का भविष्य एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। यदि जंगल सुरक्षित रहेंगे तो जल, वायु, मिट्टी और जैव विविधता सुरक्षित रहेगी; और यदि बाघ सुरक्षित रहेंगे तो जंगल भी सुरक्षित रहेंगे। इसलिए बाघों का संरक्षण केवल वन्यजीव संरक्षण नहीं, बल्कि पृथ्वी पर जीवन के संरक्षण का अभियान है।

जंगल का गौरव, वन का मान,
बाघ है प्रकृति की अनुपम शान।
उससे ही वन का संतुलन कायम,
उससे ही जीवन रहता कायम।
बाघ बचे तो वन भी बचेंगे,
नदियों के निर्मल जल बहेंगे।
आओ मिलकर लें यह संकल्प महान,
बाघों से ही सुरक्षित है धरती की पहचान॥

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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