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बच्चों को पेड़ों से दोस्ती और प्रकृति से प्रेम करना सिखाती ‘बोल उठे बरगद दादा’

बालमन की जिज्ञासा, पर्यावरण चेतना और वृक्षों के वैज्ञानिक-सांस्कृतिक महत्व का रोचक संगम

आज जब शहरीकरण, तकनीक और बदलती जीवनशैली के कारण बच्चों का प्रकृति से सीधा जुड़ाव लगातार कम होता जा रहा है, ऐसे समय में बाल साहित्य की जिम्मेदारी केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रह जाती। बच्चों को प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाना भी उसका महत्वपूर्ण उद्देश्य है। इसी दिशा में लेखिका नीलम राकेश का एकांकी-संग्रह ‘बोल उठे बरगद दादा’ एक सार्थक और रोचक प्रयास है।

यह पुस्तक बच्चों को पेड़ों के बारे में जानकारी भर नहीं देती, बल्कि उनसे दोस्ती करना सिखाती है। इसकी सबसे बड़ी खूबी है इसका सहज और कल्पनाशील संवाद-शिल्प। कहानी में चिंटू और चिंकी नामक दो जिज्ञासु बच्चे अपनी माँ के साथ एक विशाल बरगद के पेड़ के पास पहुंचते हैं। तभी उनकी मुलाकात होती है ‘बरगद दादा’ से, जो बच्चों से बातें करते हैं। यहीं से शुरू होती है ज्ञान, कल्पना और प्रकृति के बीच एक दिलचस्प यात्रा।

वृक्षों की दुनिया से रोचक परिचय

संग्रह में बरगद, नीम, सीता अशोक, बबूल, गुलमोहर और अर्जुन जैसे महत्वपूर्ण वृक्षों को केंद्र में रखकर छह एकांकियाँ प्रस्तुत की गई हैं। चिंटू और चिंकी के सहज सवालों के माध्यम से बच्चों को इन वृक्षों की पहचान, उपयोगिता, औषधीय गुणों, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व और पर्यावरण में उनकी भूमिका के बारे में बताया गया है।

पुस्तक की विशेषता यह है कि जानकारी को पाठ्यपुस्तक की तरह बोझिल तरीके से प्रस्तुत नहीं किया गया। संवादों, लोककथाओं, पौराणिक प्रसंगों और रोचक तथ्यों के माध्यम से विषय को इस तरह आगे बढ़ाया गया है कि बच्चे पढ़ते-पढ़ते नई बातें सीखते चलते हैं। वैज्ञानिक तथ्यों को भी लेखिका ने सरल भाषा में समझाने का प्रयास किया है।

मनोरंजन के साथ पर्यावरण का संदेश

‘बोल उठे बरगद दादा’ का महत्व केवल वृक्षों की जानकारी देने में नहीं है। इसके केंद्र में प्रकृति के प्रति आत्मीयता का भाव है। पुस्तक बच्चों को समझाती है कि पेड़ केवल छाया, फल, फूल या लकड़ी देने वाले प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि पृथ्वी के पर्यावरण और मानव जीवन के अनिवार्य साथी हैं।

आज जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, बढ़ते प्रदूषण और घटती हरियाली जैसी चुनौतियों के बीच बच्चों में पर्यावरण चेतना विकसित करना बेहद जरूरी है। पुस्तक वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण का संदेश उपदेशात्मक तरीके से देने के बजाय कहानी और संवाद के माध्यम से बच्चों के मन तक पहुंचाती है।

बाल पाठकों के लिए उपयोगी संग्रह

सरल भाषा, जीवंत पात्र, सहज संवाद और ज्ञानवर्धक विषय-वस्तु इस पुस्तक को बाल पाठकों के लिए उपयोगी बनाते हैं। खास बात यह है कि इसमें विज्ञान, प्रकृति, संस्कृति और साहित्य का सुंदर मेल दिखाई देता है। बच्चे इसे मनोरंजन के लिए पढ़ सकते हैं, वहीं अभिभावक और शिक्षक प्रकृति एवं पर्यावरण के प्रति बच्चों की रुचि बढ़ाने के लिए इसका उपयोग कर सकते हैं।

कुल मिलाकर, ‘बोल उठे बरगद दादा’ ऐसी बाल पुस्तक है जो बच्चों को पेड़ों को केवल देखने नहीं, बल्कि उन्हें जानने, समझने और उनका महत्व महसूस करने के लिए प्रेरित करती है। पुस्तक पढ़ने के बाद यदि कोई बच्चा अपने आसपास खड़े किसी बरगद, नीम, गुलमोहर या अर्जुन को नई उत्सुकता से देखने लगे, तो यही इस रचना की सार्थकता कही जाएगी।

पुस्तक: बोल उठे बरगद दादा (एकांकी-संग्रह)
लेखिका: नीलम राकेश

डॉ. उमेशचन्द्र सिरसवारी
डॉ. उमेशचन्द्र सिरसवारी


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