प्रकृति ने पंछी को पंख दिए,
जल को लहर, गगन को विस्तार।
सबने मर्यादा ओढ़ी अपनी,
केवल मानव हुआ गद्दार।
तुझको बुद्धि, विवेक, वाणी,
धरती का संपूर्ण विधान मिला;
तूने बदले में माँ की छाती
चीरने का ही दुष्कर्म किया।
वन काटे, निर्झर बाँध दिए,
विष घोला हर श्वास-प्राण में;
फिर भी कहता “मैं विजेता हूँ”,
अपने ही विजित श्मशान में।
मत भूल, प्रकृति की चुप्पी
उसकी कमजोरी नहीं होती;
रुद्र जब आँखें खोलते हैं,
सृष्टि सफाई करती है,रोती नहीं।
अब तो संभल, अभिमान छोड़ दे,
धरती प्रकृति कोई बाज़ार नहीं;
प्रकृति से जो युद्ध करेगा,
उसका फिर उद्धार नहीं
उसका फिर कोई उद्धार नहीं।।

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस