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इलेक्ट्रोनिक गजेट्स का इस्तेमाल रखें: सीमित नही तो हो सकता है नुकसान

आज की युवा पीढ़ी अब देर रात तक इंटरनेट, कंप्यूटर, आई-पैड, आई-पौड या मोबाइल में लगी रहती है। युवा पीढ़ी ही नहीं बल्कि बच्चे, किशोर आदि सबको तो मानों जैसे इलैक्टिोनिक गजेट्स का चसका लगा हुआ है। कई बार यह सवाल उठता है कि यह कहां तक सही है? वैसे अगर देखा जाए तो प्रकृति का नियम है कि हर चीज का अगर फायदा है तो नुकसान भी अवश्य ही होता है। जहां विज्ञान एक और तरक्की पर तरक्की कर रहा है, वहीं यह विकास अपने साथ कई प्रकार की समस्याओं, परेशानियों, बीमारियों व कई प्रकार की अन्य हानियों को न्यौता भी दे रहा है।
यह कहना गलत तो नहीं होगा कि इलैक्टिोनिक गजेट्स का इस्तेमाल हमारे जीवन का अब एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। उसके बिना हम अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। खैर, इन चीजों को अपने जीवन में उतनी ही तवज्जो देने में तब तक कोई बुराई नहीं है जब तक ये हमें अपना गुलाम न बनाने लगें। क्यों कि आज कल तो ऐसा ही हो रहा है। बच्चे या किशोर, देर रात तक इलैक्टिोनिक गजेट्स का इस्तेमाल करते रहते हैं। ऐसा लगता है मानों उसके गुलाम बनते जा रहे हैं। अब चाहे फेसबुक हो, टिवटर हो इंस्टाग्राम हो या अन्य साइट हो या फिर गेम खेलना, गाने सुनना या चौटिंग करना आदि इन किशोरों की हिटलिस्ट में रहता है। वे इन सब गतिविधियों में इतना उलझ जाते हैं कि उन्हें समय का ध्यान ही नहीं रहता है। इसके अलावा वे कई बीमारियों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
इसका सबसे बड़ा नुकसान होता है समाज से कटाव। जरूरत से अधिक समय इन गतिविधियों पर देने से किशोर इनके आदी हो जाते हैं। उन्हें अपने मां-बाप, रिश्तेदार, भाई-बहन या किसी प्रकार के कार्यक्रम में कोई रुचि नहीं रहती है। वे अकेले ही रहना चाहते हैं। उन्हें किसी सेकोई मतलब नहीं रहता है। इस तरह वे समाज से दूर होते चले जाते हैं। सबसे उनका रिश्ता टूट सा जाता है। वैसे भी इलैक्टिक गजेट्स से उन्हें इतना प्यार हो जाता है कि उन्हें और कुछ पसंद ही नहीं आता। अगर जबरदस्ती उन्हें कहीं लेकर भी जाओ तो उनका मन भी नहीं लगता और वे बोर होते रहते हैं और चिढ़ते रहते हैं।
किशोर भावनात्मक तौर पर भी अपना नुकसान करते हैं। हमेशा इन चीजों में उलझे रहने से वे एक प्रकार के आर्टीफिश्यल माहौल से घिर जाते हैं और सच्चाई से उनका नाता टूटता जाता है। उन्हें भ्रम में रहने की आदत हो जाती है। अधिकतर किशोर तो अश्लील फोटो या फिल्म देखते हैं, जिससे उनके मन में इन सब चीजों के प्रति आर्कषण पैदा होने लगता है। किशोरों को यह भी समझ नहीं आता है कि इन सबसे वे अपना शारीरिक तौर पर भी नुकसान कर रहे हैं क्यों कि बार-बार माउस या कंप्यूटर आदि पर बैठने से उनकी रीढ़ की हड्डी में कुछ न कुछ समस्या पैदा होने लगती है। हाथों में कार्पल टनल सिंडोम होने का खतरा भी बढ़ जाता है। इसके अलावा देर रात तक बैठने से नींद खराब होती है। जिससे कई और समस्याएं पैदा हो जाती हैं। जैसे नींद न आने की बीमारी, तनाव, डिप्रेशन, चिढ़चिढ़ापन आदि. फिर पूरा समय बैठै रहने से शरीर का कोई व्यायाम भी नहीं हो पाता है। तो, खाना न पचना, भूख न लगने की समस्या भी पैदा हो सकती है। शरीर भी बिगड़ जाता है। मोटापा भी बढने लगता है।
इसके अलावा दिन भर इन चीजों में उलझे रहने से आंखों को तो बहुत ही अधिक नुकसान पहुंचता है। इन गजेट्स से निकलने वाली किरणें आंखों की मांसपेशियों को कमजोर बना देती हैं। फलतः आंखों को जल्द ही चश्मा लग जाता है। इसका एक नुकसान यह भी होता है कि यदि आप स्कूल में हैं या कालेज में हैं, तो आप की परर्फोमेंस दिनों दिन गिरती चली जाती है। आप का अपने कोर्स या पढ़ाई में बिल्कुल मन नहीं लगता और आप उसमें कमजोर हो जाते हैं। कभी-कभी तो नौबत यह भी आ जाती है कि आप फेल हो जाते हैं। इन किशोरों का बिहेवियर भी थोड़ा सा बदलने लगता है। वे अक्सर चिढ़चिढ़े और गुस्सैल हो जाते हैं। उन्हें बात-बात पर गुस्सा आ जाता है। वे किसी से बात करना या किसी की बात सुनना भी पसंद नहीं करते हैं। धीरे-धीरे वे जिद्दी हो जाते हैं। यहां तक कि वे छोटी सी बात पर किसी से लड़ भी सकते हैं यहां तक कि मार पिटाई पर भी उतारू हो जाते हैं।
किशोरों को इन सबमें ही रुचि रहती है, इसलिए वे किसी प्रकार का शारीरिक व्यायाम करना पसंद नहीं करते हैं। वैसे, तो अगर ये इलैक्टोनिक गजेट्स न हों तो वे बाहर खेलने जाते हैं जैसे क्रिकेट, फुटबाल या साइकिल चलाना आदि। लेकिन, गेम्स आने से वे सिर्फ गेम्स में ही अपना समय व्यतीत करना चाहते हैं।
एक और दूसरा नुकसान यह है कि अक्सर लोग कुछ भी काम करते रहते हैं लेकिन कान में हेड फोन लगाए रखते हैं। बस में, मेटो में क्लास में खाना खाते समय कान में हेड फोन लगाकर गाने सुनते रहने के भी कई नुकसान होते हैं। उसके अलावा हेड फोन लगाकर गाने सुनना या फोन पर बात करते हुए में जान जाने का भी खतरा होता है। क्यों कि कई बार लोग गाड़ी चलाते वक्त गाने सुनते हैं या फोन पर बात करते रहते हैं लेकिन हर बात वे लोग सौभाग्यशाली नहीं होते और दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। इसीलिए इन गजेट्स का उपयोग या इस्तेमाल तक ही सीमित रहे तो अच्छा है अन्यथा कब हम इनकी चुंगल में फंस जाएंगे और बर्बादी की ओर अग्रसर हो जाएंगे? हमें पता भी नहीं चलेगा । प्रस्तुति:सोनी राय

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