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शिक्षा में न्यायपालिकाः संवाद की जरूरत या विवाद की राजनीति?

एक बार फिर शिक्षा से जुड़ा एक प्रश्न राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है। शिक्षा मंत्रालय और राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा प्रकाशित आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में “हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका” शीर्षक अध्याय में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और लंबित मुकदमों का उल्लेख किए जाने पर भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने नाराजगी प्रकट की। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की यह टिप्पणी कि “किसी को भी न्यायपालिका को बदनाम करने नहीं दिया जाएगा” केवल एक भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि संस्थागत गरिमा की रक्षा का संकेत है। इसके बाद संबंधित अध्याय को हटाने और बाजार में उपलब्ध पुस्तकों को वापस लेने का निर्णय लिया गया। प्रश्न यह है कि क्या यह केवल एक संपादकीय चूक थी या हमारे शैक्षिक ढांचे में कहीं गहरी संरचनात्मक कमी है? प्रश्न है कि स्कूली बच्चों को ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ के बारे में जानकारी देने से किस हित की पूर्ति होने वाली है? लेकिन इसमें दो मत नहीं है कि न्यायिक तंत्र के साथ हर क्षेत्र में फैली भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के ठोस उपाय होने ही चाहिए। सबसे पहले यह भी स्वीकार करना होगा कि न्यायपालिका में लंबित मामलों और भ्रष्टाचार जैसे प्रश्न पूरी तरह काल्पनिक नहीं हैं। न्यायालयों में लंबित मुकदमों की संख्या करोड़ों में है, यह एक सार्वजनिक तथ्य है। कुछ मामलों में न्यायिक आचरण पर भी प्रश्न उठे हैं। परंतु उतना ही सत्य यह भी है कि भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर अपनी स्वतंत्रता, पारदर्शिता और सक्रियता से लोकतंत्र की रक्षा की है। पिछले वर्षों में शीर्ष न्यायाधीशों द्वारा अपनी संपत्तियों का सार्वजनिक विवरण देने की सहमति जैसे कदमों ने संस्थागत पारदर्शिता को सुदृढ़ किया है। ऐसे में प्रश्न यह नहीं है कि समस्या है या नहीं, प्रश्न यह है कि उसे किस भाषा, किस संतुलन और किस शैक्षिक दृष्टि से प्रस्तुत किया जाए।

शिक्षा का उद्देश्य केवल तथ्य देना नहीं, दृष्टि देना है। यदि हम बच्चों को यह सिखाते हैं कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, तो साथ ही यह भी सिखाना होगा कि न्यायपालिका ने भ्रष्टाचार से लड़ने में कैसी भूमिका निभाई है, उसने प्रशासनिक दुरुपयोग पर कैसे अंकुश लगाया है, नागरिक अधिकारों की रक्षा में कैसे ऐतिहासिक निर्णय दिए हैं। शिक्षा में आलोचना हो, पर निराशा नहीं, तथ्य हों, पर संतुलन भी हो। यदि किसी अध्याय में केवल संस्थागत विकृतियों का उल्लेख हो और सुधारात्मक प्रयासों, आदर्श उदाहरणों और संवैधानिक मूल्यों का समुचित विवेचन न हो, तो वह शिक्षा में मूल्यों एवं आदर्शों के बजाय अविश्वास का बीजारोपण बन सकता है। यह विवाद एक बड़े प्रश्न को भी जन्म देता है-पाठ्य पुस्तकों की निर्माण प्रक्रिया में बहुस्तरीय समीक्षा के बावजूद ऐसी सामग्री कैसे प्रकाशित हो जाती है? क्या संपादकीय बोर्ड में विविध दृष्टिकोणों का अभाव है? क्या विधि विशेषज्ञों, शिक्षाशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों के बीच समन्वय पर्याप्त नहीं है? एक लोकतांत्रिक समाज में संस्थाओं की आलोचना वर्जित नहीं हो सकती, पर आलोचना और अवमूल्यन के बीच महीन रेखा होती है। शिक्षा मंत्रालय और एनसीईआरटी जैसी संस्थाओं का दायित्व है कि वे इस रेखा को पहचानें।

यह भी स्मरणीय है कि भ्रष्टाचार केवल न्यायपालिका तक सीमित समस्या नहीं है। हाल ही में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की इसी महीने जारी रिपोर्ट के मुताबिक करप्शन परसेप्शन इंडेक्स में 182 देशों के बीच भारत की रैंक 91 है। पिछले साल के मुकाबले भारत ने 5 स्थान का सुधार किया है, यह स्थिति सुधार के बावजूद मध्य स्तर पर बनी हुई बताई गई है। इसका अर्थ है कि भ्रष्टाचार एक संरचनात्मक, सामाजिक और प्रशासनिक चुनौती है। यदि हम बच्चों को इसके बारे में पढ़ाते हैं तो उसे एक समग्र सामाजिक संदर्भ में पढ़ाया जाना चाहिए कि यह समस्या क्यों उत्पन्न होती है, इसे रोकने के लिए क्या संवैधानिक तंत्र हैं, नागरिकों की क्या भूमिका है और सुधार की संभावनाएं क्या हैं। केवल किसी एक संस्था को केंद्र में रखकर समस्या का चित्रण करना न तो शैक्षिक रूप से न्यायोचित है और न ही संवैधानिक संतुलन के अनुरूप।

न्यायपालिका की गरिमा का प्रश्न भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र तीन स्तंभों-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर आधारित है। यदि किसी एक स्तंभ के प्रति बच्चों के मन में अविश्वास की भावना बिना सम्यक् विश्लेषण के उत्पन्न हो जाए, तो यह दीर्घकाल में लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए हानिकारक हो सकता है। परंतु गरिमा की रक्षा का अर्थ यह भी नहीं कि समस्याओं पर मौन साध लिया जाए। गरिमा और पारदर्शिता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। न्यायपालिका की वास्तविक प्रतिष्ठा उसकी आलोचना सहने की क्षमता, आत्मसुधार की तत्परता और नैतिक दृढ़ता से बढ़ती है। इस संदर्भ में एक नई शैक्षिक संरचना की आवश्यकता अनुभव होती है। पाठ्य पुस्तकों में “संस्थागत अध्ययन” का प्रारूप इस प्रकार विकसित किया जा सकता है जिसमें तीन आयाम हों-संविधान द्वारा प्रदत्त भूमिका, वास्तविक चुनौतियां और सुधार की पहल। उदाहरण के लिए, न्यायपालिका पर अध्याय में उसके ऐतिहासिक निर्णय, जनहित याचिका की परंपरा, मौलिक अधिकारों की रक्षा, साथ ही लंबित मामलों की समस्या और न्यायिक सुधार आयोगों की सिफारिशों का संतुलित उल्लेख किया जाए। इससे छात्र न तो अंधभक्त बनेंगे और न ही निंदक, वे सजग नागरिक बनेंगे।

शिक्षा मंत्रालय को भी इस अवसर को आत्ममंथन के रूप में लेना चाहिए। विवाद के बाद अध्याय हटाना तात्कालिक समाधान हो सकता है, पर स्थायी समाधान नहीं। आवश्यकता है एक स्वतंत्र, बहुविषयी समीक्षा तंत्र की, जिसमें विधि विशेषज्ञ, पूर्व न्यायाधीश, शिक्षाशास्त्री, समाजशास्त्री और बाल मनोविज्ञान के जानकार शामिल हों। साथ ही, सार्वजनिक परामर्श की परंपरा विकसित की जा सकती है ताकि पाठ्य पुस्तकें केवल सरकारी दस्तावेज न रहकर सामाजिक सहमति का दस्तावेज बनें। न्यायपालिका भी इस प्रसंग में रचनात्मक पहल कर सकती है। यदि वह स्वयं विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के लिए न्यायिक साक्षरता कार्यक्रम आरंभ करे, न्यायालयों के कार्यप्रणाली पर सरल और संतुलित अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराए, तो इससे भ्रांतियों का निवारण होगा। न्यायपालिका की पारदर्शिता और संवादशीलता उसकी गरिमा को और सुदृढ़ करेगी।

अंततः यह विवाद हमें यह सोचने को विवश करता है कि हम अपने बच्चों को कैसी नागरिकता का संस्कार देना चाहते हैं। क्या हम उन्हें केवल समस्याओं का बोध देंगे या समाधान की प्रेरणा भी देंगे? क्या हम उन्हें संस्थाओं पर अविश्वास करना सिखाएँगे, या सुधार में सहभागी बनने की चेतना से सम्पन्न बनायेंगे? लोकतंत्र का भविष्य पाठ्य पुस्तकों की पंक्तियों में ही आकार लेता है। इसलिए आवश्यक है कि शिक्षा में सत्य हो-पर संतुलित, आलोचना हो-पर रचनात्मक और संस्थाओं की गरिमा अक्षुण्ण रखते हुए सुधार की राह भी खुली रहे। भ्रष्टाचार एक गंभीर राष्ट्रीय चुनौती है, पर उसका समाधान संस्थाओं को कटघरे में खड़ा कर देने से नहीं, बल्कि उन्हें अधिक उत्तरदायी और पारदर्शी बनाकर ही निकलेगा। शिक्षा का कार्य इसी संतुलन को साधना है। यदि यह विवाद हमें अधिक परिपक्व, संवादशील और उत्तरदायी शैक्षिक व्यवस्था की ओर ले जाए, तो यह एक नई दिशा, नई दृष्टि और नई संरचना के प्रादुर्भाव का अवसर सिद्ध हो सकता है। लोकतंत्र की सच्ची शक्ति आलोचना और आत्मसुधार के समन्वय में ही निहित है, और यही संतुलन हमारी पाठ्य पुस्तकों में भी प्रतिबिंबित होना।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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