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कब तक दोहराई जाती रहेंगी निर्भया जैसी त्रासदियां ?

दिल्ली के नांगलोई में एक निजी बस के भीतर महिला के साथ हुई बस कंडक्टर एवं ड्राइवर के दुष्कर्म की घटना ने एक बार फिर पूरे देश की चेतना को झकझोर दिया है। यह घटना केवल एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि उस भयावह सामाजिक और प्रशासनिक विफलता का आईना है, जो वर्षों से हमारे सामने खड़ी है। चौदह वर्ष पहले निर्भया कांड के बाद देश की सड़कों पर जनसैलाब उमड़ा था। लोगों ने सोचा था कि अब व्यवस्था बदलेगी, कानून सख्त होंगे, महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित होगी और समाज अपनी सोच बदलेगा। लेकिन आज जब उसी प्रकार की घटनाएं पुनः पुनः सामने आती हैं, तब यह प्रश्न और भी तीखा होकर उठता है कि आखिर हम बदले कहां हैं? सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर बार-बार ऐसी घटनाएं क्यों हो रही हैं?

इसका उत्तर केवल कानून की कमजोरी में नहीं, बल्कि समाज की उस विकृत मानसिकता में छिपा है, जहां महिला को आज भी बराबरी के सम्मान के साथ नहीं देखा जाता। आधुनिकता के चमकदार दावों के बीच भी पुरुष प्रधान सोच का अंधेरा जस का तस मौजूद है। महिलाओं को व्यक्ति नहीं, बल्कि उपभोग की वस्तु मानने वाली सोच आज भी अनेक मन-मस्तिष्कों में गहराई तक बैठी हुई है। यही कारण है कि सार्वजनिक स्थानों, कार्यस्थलों, स्कूल-कॉलेजों और यहां तक कि घरों के भीतर भी महिलाएं असुरक्षा का अनुभव करती हैं।

विडंबना यह है कि विज्ञान, तकनीक और आर्थिक विकास के इस दौर में भी समाज स्त्री के सम्मान और सुरक्षा के बुनियादी संस्कार विकसित नहीं कर पाया। बच्चों को शिक्षा तो दी जा रही है, लेकिन संवेदनाएं नहीं दी जा रहीं। घरों में बेटियों पर नियंत्रण और बेटों को छूट देने वाली मानसिकता आज भी कायम है। एक ओर लड़कियों को “सावधान रहने” की नसीहत दी जाती है, दूसरी ओर लड़कों को अपने व्यवहार और दृष्टि की मर्यादा सिखाने की गंभीर कोशिश बहुत कम दिखाई देती है। यही असंतुलन आगे चलकर अपराधों की जमीन तैयार करता है। प्रश्न यह भी है कि प्रशासन बार-बार ऐसी घटनाओं को रोकने में नाकाम क्यों हो रहा है? निर्भया कांड के बाद महिला सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए थे। सीसीटीवी कैमरे, महिला हेल्पलाइन, फास्ट ट्रैक कोर्ट, पुलिस गश्त और सार्वजनिक परिवहन में सुरक्षा उपायों की लंबी घोषणाएं हुईं। लेकिन वास्तविकता यह है कि इन व्यवस्थाओं का बड़ा हिस्सा कागजों और भाषणों तक सीमित रह गया। निजी बसें आज भी बिना पर्याप्त निगरानी के चल रही हैं। कई स्थानों पर चालक और परिचालकों का समुचित सत्यापन तक नहीं होता। सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन अक्सर केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है।

दुनियाभर में बालिकाओं के अस्तित्व एवं अस्मिता के लिये जागरूकता एवं आन्दोलनों के बावजूद बालिकाओं पर अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं। हमारे देश में भी ऐसा ही हो रहा है, बालिकाओं की स्थिति, लड़कियों की तुलना में लड़कों की बढ़ती संख्या, तलाक के बढ़ते मामले, गांवों में बालिका की अशिक्षा, कुपोषण एवं शोषण, बालिकाओं की सुरक्षा, बालिकाओं के साथ होने वाली बलात्कार की घटनाएं, अश्लील हरकतें और विशेष रूप से उनके खिलाफ होने वाले अपराधों पर प्रभावी चर्चा एवं कठोर निर्णयों से एक सार्थक वातावरण का निर्माण किये जाने की अपेक्षा है। क्योंकि एक टीस-सी मन में उठती है कि आखिर महिलाएं एवं बालिकाओं कब तक भोग की वस्तु बनी रहेगी? उसका जीवन कब तक खतरों से घिरा रहेगा? बलात्कार, छेड़खानी, भ्रूण हत्या और दहेज की धधकती आग में वह कब तक भस्म होती रहेगी? कब तक उसके अस्तित्व एवं अस्मिता को नौचा जाता रहेगा?

सच्चाई यह है कि हमारी व्यवस्था अपराध होने के बाद सक्रिय होती है, अपराध रोकने के लिये नहीं। हर बार घटना के बाद गिरफ्तारी, जांच और बयानबाजी होती है, लेकिन अपराध की जड़ों तक पहुंचने की गंभीर पहल नहीं दिखाई देती। राजनीतिक दल कुछ दिनों तक आरोप-प्रत्यारोप करते हैं, मीडिया में बहस चलती है और फिर धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य मान लिया जाता है। लेकिन जिन परिवारों की बेटियां इस अमानवीयता का शिकार होती हैं, उनके जीवन में भय, पीड़ा और असुरक्षा स्थायी घाव बनकर रह जाते हैं। यह भी विचारणीय है कि आखिर महिलाएं और बालिकाएं बार-बार ऐसे अत्याचारों का शिकार क्यों बन रही हैं? इसका कारण केवल अपराधियों की क्रूरता नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनहीनता भी है। सार्वजनिक स्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सामूहिक जिम्मेदारी का अभाव दिखाई देता है। लोग तमाशबीन बन जाते हैं।

कई बार पीड़िता को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है-उसके कपड़े, समय, जीवनशैली और व्यवहार पर सवाल उठाए जाते हैं। यह मानसिकता अपराधियों का मनोबल बढ़ाती है, क्योंकि उन्हें पता होता है कि समाज पूरी तरह पीड़िता के साथ खड़ा नहीं होगा। कब तक महिलाएं अपने ही शहरों, बसों, गलियों और कार्यस्थलों पर भय के साथ जीती रहेंगी? कब तक माता-पिता अपनी बेटियों के घर लौटने तक चिंता में डूबे रहेंगे? यह प्रश्न केवल महिलाओं का नहीं, बल्कि पूरे समाज की आत्मा का प्रश्न है। जिस समाज में आधी आबादी स्वयं को सुरक्षित महसूस न करे, वह समाज वास्तव में सभ्य नहीं कहलाया जा सकता।

आज आवश्यकता केवल कठोर कानूनों की नहीं, बल्कि कठोर सामाजिक आत्ममंथन की है। कानून अपराधी को दंड दे सकता है, लेकिन समाज ही मानसिकता बदल सकता है। स्कूलों और परिवारों में लैंगिक संवेदनशीलता की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए। बेटियों को भय में जीना नहीं, बल्कि सम्मानपूर्वक जीना सिखाना होगा। फिल्मों, सोशल मीडिया और विज्ञापनों में स्त्री की वस्तुवादी छवि पर भी गंभीर विमर्श जरूरी है, क्योंकि संस्कृति और मनोरंजन भी समाज की सोच को प्रभावित करते हैं। प्रशासन को भी केवल घटनाओं के बाद की कार्रवाई तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सार्वजनिक परिवहन में रियल-टाइम जीपीएस, सीसीटीवी, पैनिक बटन और नियमित निगरानी को पूरी कठोरता से लागू करना होगा। निजी परिवहन संचालकों और कर्मचारियों का गहन सत्यापन अनिवार्य किया जाना चाहिए। पुलिस व्यवस्था को अधिक संवेदनशील, जवाबदेह और सक्रिय बनाना होगा। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि समाज को यह समझना होगा कि महिला सुरक्षा कोई “महिला मुद्दा” नहीं, बल्कि मानवता और सभ्यता का प्रश्न है। जब तक स्त्री को समान सम्मान, स्वतंत्रता और सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक विकास के सारे दावे अधूरे रहेंगे।

नांगलोई की यह घटना केवल एक समाचार नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। यदि अब भी हम नहीं जागे, तो निर्भया जैसी त्रासदियां बार-बार हमारे सामने आती रहेंगी और हर बार हमारी संवेदनहीनता, हमारी प्रशासनिक विफलता और हमारी विकृत मानसिकता हमें कठघरे में खड़ा करती रहेगी। प्रश्न यही है-आखिर कब तक? तमाम जागरूकता एवं सरकारी प्रयासों के बावजूद भारत में भी बालिकाओं की स्थिति में यथोचित बदलाव नहीं आया है। धर्मगुरु, राजनेता एवं समाजसुधारक महिलाओं एवं बालिकाओं के प्रति कितनी कुत्सित मानसिकता का परिचय देते आए हैं, यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है। इनके चरित्र का दोहरापन जगजाहिर हो चुका है।

कोई क्या पहने, क्या खाए, किससे प्रेम करे और किससे शादी करें, सह-शिक्षा का विरोधी नजरिया- इस तरह की पुरुषवादी सोच के तहत बालिकाओं को उनके हकों से वंचित किया जा रहा है, उन पर तरह-तरह की बंदिशें एवं पहरे लगाये जा रहे हैं। ‘यत्र पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता’- जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। किंतु आज हम देखते हैं कि नारी का हर जगह अपमान होता चला जा रहा है। उसे ‘भोग की वस्तु’ समझकर आदमी ‘अपने तरीके’ से ‘इस्तेमाल’ कर रहा है, यह बेहद चिंताजनक बात है। आज अनेक शक्लों में नारी के वजूद को धुंधलाने की घटनाएं शक्ल बदल-बदल कर काले अध्याय रच रही है। देश में गैंग रेप की वारदातों में कमी भले ही आयी हो, लेकिन उन घटनाओं का रह-रह कर सामने आना त्रासद एवं दुःखद है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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