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दवा नहीं, जहर का कारोबार: भारत की साख पर संकट

पिछले दिनों सामने आई खबरों ने पूरे देश को चिंता और बेचैनी में डाल दिया कि जीवनरक्षक और सामान्य उपयोग की अनेक दवाइयां गुणवत्ता के मानकों पर खरी नहीं उतरीं। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन द्वारा जारी ड्रग अलर्ट में जिन दवाओं के नमूने फेल पाए गए, उनमें हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मिर्गी, संक्रमण, विटामिन सप्लीमेंट और कफ सिरप जैसी आम उपयोग की दवाएं भी शामिल थीं। यह कोई सामान्य प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि मानव जीवन के साथ किया जा रहा ऐसा खतरनाक खिलवाड़ है, जिसने देश की स्वास्थ्य सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। जिस दवा को रोगी जीवन बचाने की आशा में खरीदता है, वही यदि उसके शरीर में जहर का काम करने लगे तो यह केवल चिकित्सा व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के पतन की पराकाष्ठा है। विडंबना यह है कि दवाओं के निर्माण और वितरण के लिए देश में कठोर नियम, निरीक्षण और परीक्षण की व्यवस्थाएं मौजूद हैं। कच्चे माल की गुणवत्ता से लेकर उत्पादन प्रक्रिया तक कई स्तरों पर जांच होती है, फिर भी बड़ी-बड़ी नामी कंपनियों की दवाइयां यदि अमानक पाई जाती हैं तो यह साफ संकेत है कि कहीं-न-कहीं मुनाफे की अंधी दौड़ ने नैतिकता और मानवता को कुचल दिया है। यह केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि मानवता के विरुद्ध अपराध है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि जिन लोगों पर समाज की जिंदगी बचाने की जिम्मेदारी है, वही लोग अपने स्वार्थ के लिए लोगों की जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं।

भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी दवा उत्पादन शक्तियों में शामिल है। भारतीय दवाइयां अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, एशिया और मध्य-पूर्व के अनेक देशों में निर्यात होती हैं। भारत को “फार्मेसी ऑफ द वल्र्ड” कहा जाता है क्योंकि सस्ती और प्रभावी दवाओं की आपूर्ति में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। कोरोना महामारी के दौरान भारत ने वैक्सीन और आवश्यक दवाइयों की आपूर्ति कर पूरी दुनिया में अपनी विश्वसनीयता और मानवीय प्रतिबद्धता का परिचय दिया था। जिन राज्यों में उत्पादित घटिया दवाओं का खुलासा हुआ, उनमें हिमाचल प्रदेश पहले पायदान पर रहा, फिर उत्तराखंड, गुजरात, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, केरल, पुडुचेरी, तेलंगाना, सिक्किम, झारखंड, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेश, ओडिशा आदि राज्य शामिल हैं। यानी एक-दो राज्य नहीं, तमाम राज्यों के दवा उत्पादक इस अपवित्र कर्म में शामिल हैं। यूं कहें कि दाल में काला नहीं है बल्कि पूरी दाल काली है। विडंबना देखिए कि कफ सिरप के 17 नमूने फेल हुए हैं। अब यह साफ हो गया कि अफ्रीका व सेंट्रल एशिया के कुछ देशों तथा भारत के कुछ राज्यों में कफ सिरप पीने से बच्चों की मौत के जो आरोप भारतीय दवा कंपनियों पर लगे थे, वे गलत नहीं थे, जिससे पूरी दुनिया में भारतीय दवा उद्योग की छवि खराब हुई।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की प्रतिष्ठा को धक्का लगता है और दुनिया भारतीय दवा उद्योग को संदेह की दृष्टि से देखने लगती है। यह स्थिति ऐसे समय में सामने आ रही है जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत 2047 तक स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने पर विकसित भारत का सपना साकार करने की दिशा में अनेक नए आयाम स्थापित कर रहा है। भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत और स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधारों के माध्यम से देश वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है। भारत को विश्वगुरु बनाने का सपना केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि नैतिकता, गुणवत्ता और विश्वसनीयता से भी जुड़ा हुआ है। यदि जीवनरक्षक दवाओं में ही मिलावट और घटियापन सामने आएगा, तो यह सारे सकारात्मक प्रयासों पर धब्बा लगाने जैसा होगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार दवा नियंत्रण व्यवस्था को और अधिक सशक्त बनाए। केवल औपचारिक निरीक्षण और समय-समय पर जारी होने वाले ड्रग अलर्ट पर्याप्त नहीं हैं। दवा निर्माण इकाइयों की नियमित और पारदर्शी जांच होनी चाहिए। जिन कंपनियों की दवाएं बार-बार मानकों पर फेल होती हैं, उनके लाइसेंस तुरंत रद्द किए जाएं और उनके खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई हो। दवा माफिया और नकली दवा बनाने वाले गिरोहों के खिलाफ विशेष अभियान चलाए जाने चाहिए। यह भी जरूरी है कि दोषियों को केवल आर्थिक जुर्माने तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें कठोर कारावास की सजा दी जाए ताकि दूसरों के लिए भी कड़ा संदेश जाए। यह भी एक गंभीर चिंता का विषय है कि कई बार राज्य सरकारें और नियामक एजेंसियां प्रभावशाली दवा कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करने से बचती दिखाई देती हैं। धनबल और प्रभाव के कारण जांच प्रक्रियाएं धीमी पड़ जाती हैं और अंततः आम जनता ही इसकी कीमत चुकाती है। यह स्थिति लोकतांत्रिक शासन और प्रशासनिक जवाबदेही दोनों के लिए खतरनाक है।
रोगी इस उम्मीद में दवा लेते हैं कि इससे उनकी बीमारी ठीक होगी। लेकिन यह पता लगे कि जिन दवाइयों का वे सेवन कर रहे  हैं वे दवा नहीं बल्कि जहर के रूप में बाजार में आ गई हैं तो क्या बीतेगी? हिंदुस्तान में आज लाखों लोगों को ये दवाएं जीवन-रक्षा नहीं दे रही है बल्कि मार रही है, इंसान का लोभ एवं लालच इंसान को मार रहा है। ऐसे स्वार्थी लोगों एवं जीवन से खिलवाड़ करने वालों को राक्षस, असुर या दैत्य कहा गया है जो समाज एवं राष्ट्र में तरह-तरह से स्वास्थ्य सुरक्षा के नाम पर मौत बांट रहे हैं। अमानक एवं गुणवत्ता में दोषपूर्ण पाई गई इन दवाओं में कई नामी कंपनियों की दवाएं भी शामिल हैं। दवा उद्योग केवल व्यापार नहीं है, यह विश्वास का उद्योग है। यहां नैतिकता का महत्व सबसे अधिक होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से आज लालच और मुनाफाखोरी ने इस क्षेत्र में भी गहरी जड़ें जमा ली हैं। नकली इंजेक्शन, मिलावटी दवाएं, एक्सपायरी दवाओं की री-पैकेजिंग और घटिया कच्चे माल के उपयोग जैसी घटनाएं यह साबित करती हैं कि समाज में संवेदनाओं का स्रोत सूखता जा रहा है। इंसान केवल अपने लाभ के लिए दूसरों की जिंदगी से खेलने को तैयार हो गया है। यह केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक पतन का भी संकेत है। आवश्यकता इस बात की भी है कि आम जनता को दवाओं के प्रति जागरूक बनाया जाए। दवा खरीदते समय बिल लेना, पैकेजिंग और निर्माण तिथि की जांच करना, संदिग्ध दवाओं की शिकायत संबंधित विभागों को करना और बिना चिकित्सकीय सलाह के दवाओं का सेवन न करना, ये सब छोटे लेकिन महत्वपूर्ण कदम हैं। मेडिकल स्टोरों की भी नियमित निगरानी होनी चाहिए ताकि नकली या घटिया दवाओं की बिक्री रोकी जा सके।

दवाओं की गुणवत्ता से खिलवाड़ दवा निर्माता कम्पनियों का एक घिनौना, क्रूर एवं अमानवीय चेहरा ही है जो मनुष्य के स्वास्थ्य को चैपट कर रहे हैं। एक तो बीमारियों का कोई कारगर इलाज नहीं है, दूसरा इन बीमारी में काम आने वाली तमाम जरूरी दवाइयां लालची लोगों ने अमानक एवं दोषपूर्ण कर दी हैं। बढ़ती बीमारियां इन राक्षसों के कारण ही बेकाबू हो रही है। सरकारें इन त्रासद स्थितियों एवं बीमारी पर नियंत्रण पाने में नाकाम साबित हुई है। देश के लाखों लोग कातर निगाहों से शासन-प्रशासन की ओर देख रहे हैं कि कोई तो राह निकले। भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर देश नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहा है, दूसरी ओर ऐसी त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण घटनाएं हमारी नैतिक और प्रशासनिक कमजोरी को उजागर कर रही हैं। यदि हम सचमुच विकसित और विश्वसनीय भारत बनाना चाहते हैं, तो हमें केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि गुणवत्ता, ईमानदारी और मानवीय मूल्यों को भी सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। जीवनरक्षक दवाओं में मिलावट केवल स्वास्थ्य का संकट नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा पर लगा कलंक है। यह समय आत्ममंथन का है। सरकार, दवा उद्योग, चिकित्सा जगत और समाज-सभी को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि दवा जीवन बचाने का माध्यम बने, मौत का व्यापार नहीं। तभी विकसित भारत का सपना वास्तविक अर्थों में सार्थक हो सकेगा।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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