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वैश्विक संकटों के दौर में परिवार ही रिश्तों की अंतिम शरणस्थली


अन्तर्राष्ट्रीय परिवार दिवस-15 मई, 2026

हर वर्ष 15 मई को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस एक मानवीय रिश्तों का उत्सव ही नहीं, बल्कि मानव सभ्यता को उसकी जड़ों की याद दिलाने का अवसर है। यह दिन हमें बताता है कि दुनिया चाहे कितनी भी आधुनिक, तकनीकी और आर्थिक रूप से विकसित क्यों न हो जाए, मनुष्य की सबसे पहली जरूरत आज भी परिवार ही है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्थापित यह दिवस इस वर्ष विशेष रूप से इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पूरी दुनिया बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, युद्ध, हिंसा, मानसिक तनाव, अकेलेपन और टूटते मानवीय विश्वासों के संकट से गुजर रही है। ऐसे कठिन समय में परिवार केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि मनुष्य के अस्तित्व, सुरक्षा, संस्कार और संवेदनाओं की सबसे मजबूत छत बनकर सामने आता है।

आज दुनिया का सबसे बड़ा संकट आर्थिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और नैतिक संकट है। बाजार की चकाचौंध ने आदमी को उपभोक्ता तो बना दिया, लेकिन संवेदनशील इंसान नहीं बना सकी। संबंधों में स्वार्थ का प्रवेश हुआ है। विश्वास की जगह संदेह ने ले ली है। आदमी मशीनों से जुड़ रहा है, लेकिन अपनों से कटता जा रहा है। युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जा रहे, वे परिवारों के भीतर भी दिखाई देने लगे हैंकृपति-पत्नी के बीच, पीढ़ियों के बीच, भाई-भाई के बीच। संवाद टूट रहे हैं, सहनशीलता घट रही है और ‘मैं’ का अहंकार ‘हम’ की भावना को निगलता जा रहा है। ऐसी परिस्थितियों में परिवार की भूमिका पहले से कहीं अधिक बढ़ जाती है। परिवार केवल रक्त संबंधों का समूह नहीं है, वह जीवन-मूल्यों का विद्यालय है। वहीं मनुष्य पहली बार प्रेम सीखता है, त्याग सीखता है, सहयोग, अनुशासन, धैर्य और सह-अस्तित्व की भावना सीखता है। यदि परिवार स्वस्थ है तो समाज स्वस्थ होगा, समाज स्वस्थ होगा तो राष्ट्र और विश्व भी संतुलित रहेंगे। इसलिए आज आवश्यकता केवल परिवार बचाने की नहीं, बल्कि परिवारों को मूल्यनिष्ठ बनाने की है।

आज जब महंगाई लगातार बढ़ रही है, जीवन की आवश्यकताएं महंगी होती जा रही हैं और बेरोजगारी युवाओं के सपनों को तोड़ रही है, तब संयुक्त परिवार की अवधारणा फिर प्रासंगिक बनती दिखाई दे रही है। संयुक्त परिवार केवल आर्थिक साझेदारी नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा का भी आधार है। वहां संसाधनों का साझा उपयोग होता है, जिम्मेदारियां बांटी जाती हैं और संकट अकेले व्यक्ति पर नहीं टूटता। अकेलेपन से उपजी अवसाद की समस्याएं संयुक्त परिवारों में अपेक्षाकृत कम दिखाई देती हैं क्योंकि वहां संवाद और अपनापन जीवित रहता है। वास्तव में आधुनिक सभ्यता ने स्वतंत्रता तो दी, लेकिन उस स्वतंत्रता ने कई बार व्यक्ति को संबंध-विहीन भी बना दिया। महानगरों के छोटे-छोटे फ्लैटों में रहने वाले हजारों लोग आर्थिक रूप से संपन्न होकर भी भीतर से बेहद अकेले हैं। वृद्ध माता-पिता उपेक्षा के शिकार हैं, बच्चे संस्कारों से दूर हो रहे हैं और पति-पत्नी के बीच संबंधों की ऊष्मा कम होती जा रही है। यही कारण है कि मानसिक रोग, तनाव, असुरक्षा और आत्महत्याओं की घटनाएं बढ़ रही हैं। यह केवल व्यक्तिगत विफलता नहीं, परिवार संस्था के कमजोर पड़ने का संकेत है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि परिवार को केवल उपभोग और सुविधा का केंद्र न बनाकर उसे “अहिंसा की प्रयोगशाला” बनाया जाए। अहिंसा का अर्थ केवल किसी को शारीरिक चोट न पहुंचाना नहीं है। कठोर शब्दों से बचना, अपमान न करना, एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना, क्रोध पर संयम रखना, संवाद बनाए रखना और क्षमा का अभ्यास करना भी अहिंसा है। यदि परिवार के भीतर हिंसक भाषा, कटुता, अपमान और असहिष्णुता होगी तो समाज में शांति की कल्पना कैसे की जा सकती है? परिवार वह पहला स्थान होना चाहिए जहां बच्चा सहिष्णुता और करुणा का पाठ सीखे। जहां उसे यह सिखाया जाए कि जीवन प्रतियोगिता नहीं, सह-अस्तित्व है। जहां बुजुर्ग बोझ नहीं, अनुभवों की धरोहर माने जाएं। जहां स्त्री को सम्मान मिले, बच्चों को संस्कार मिले और युवाओं को विश्वास मिले। आज दुनिया में बढ़ती हिंसा का एक बड़ा कारण यह भी है कि परिवारों में संवाद और संवेदना कमजोर हो रही है। बच्चे मोबाइल से बातें कर रहे हैं, लेकिन माता-पिता से नहीं। परिवार साथ रहते हुए भी भीतर से बिखर रहा है। जलवायु परिवर्तन, युद्ध और आर्थिक अस्थिरता ने पूरी दुनिया को असुरक्षित बना दिया है। यूक्रेन-रूस युद्ध हो या पश्चिम एशिया के संघर्ष, इन सबका सबसे अधिक प्रभाव परिवारों पर ही पड़ता है। लाखों लोग विस्थापित हो जाते हैं, बच्चे अनाथ हो जाते हैं और महिलाएं असुरक्षा का सामना करती हैं। इन वैश्विक संकटों के बीच परिवार ही वह इकाई है जो टूटे हुए मनुष्य को फिर जीने का साहस देती है। इसलिए संयुक्त राष्ट्र इस वर्ष परिवार-केंद्रित नीतियों पर विशेष बल दे रहा है। क्योंकि सतत विकास केवल आर्थिक विकास से संभव नहीं, बल्कि मजबूत और मूल्यनिष्ठ परिवारों से ही संभव है।

भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति भी उसका परिवार तंत्र रहा है। यहां परिवार केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संस्था है। रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य केवल युद्ध कथाएं नहीं, बल्कि पारिवारिक मूल्यों, संबंधों, कर्तव्यों और त्याग की महान गाथाएं हैं। भारतीय जीवनदृष्टि “वसुधैव कुटुम्बकम्” की बात करती हैकृअर्थात पूरी पृथ्वी ही परिवार है। यदि इस भावना को व्यवहार में उतारा जाए तो युद्ध, हिंसा, आतंक और घृणा की कोई जगह नहीं बचेगी। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज परिवारों में भी उपभोक्तावादी संस्कृति प्रवेश कर चुकी है। रिश्तों को भी लाभ-हानि के तराजू पर तौला जाने लगा है। सहनशीलता कम हो रही है और अपेक्षाएं बढ़ रही हैं। छोटी-छोटी बातों पर टूटते संबंध इस बात का संकेत हैं कि हमने सुविधा तो बढ़ाई, लेकिन संवेदना खो दी। जबकि परिवार की असली ताकत संपत्ति नहीं, बल्कि विश्वास होता है। जहां विश्वास बचा रहता है, वहां अभाव भी उत्सव बन जाते हैं; और जहां विश्वास टूट जाता है, वहां वैभव भी बोझ बन जाता है।

आज परिवारों को नई दिशा देने की आवश्यकता है। घरों में सामूहिक भोजन की परंपरा लौटे, संवाद का समय तय हो, बुजुर्गों के अनुभवों को महत्व मिले, बच्चों को केवल करियर नहीं बल्कि चरित्र निर्माण की शिक्षा मिले। परिवारों में क्रोध के स्थान पर करुणा, प्रतिस्पर्धा के स्थान पर सहयोग और अधिकार के स्थान पर कर्तव्य की भावना विकसित करनी होगी। यही परिवार को अहिंसा की प्रयोगशाला बना सकता है। दरअसल, भविष्य की सबसे बड़ी लड़ाई हथियारों की नहीं, मूल्यों की होगी। जिस समाज के परिवार टूट जाएंगे, वहां सामाजिक स्थिरता भी नहीं बचेगी। इसलिए अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस केवल उत्सव का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। हमें सोचना होगा कि हम अपने बच्चों को कैसी दुनिया देना चाहते हैंकृघृणा और अकेलेपन की दुनिया या प्रेम और विश्वास की दुनिया? यदि परिवारों में प्रेम, संवाद, सहिष्णुता, अहिंसा और साझेदारी का वातावरण बनेगा तो दुनिया के बड़े से बड़े संकटों का सामना किया जा सकता है। परिवार केवल एक सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा का आश्रय है। वह जीवन की तपती धूप में शीतल छांव है, संघर्षों में सहारा है और टूटते विश्वासों के बीच उम्मीद की अंतिम किरण है। इसलिए आज सबसे बड़ी जरूरत है परिवार को बचाने की नहीं, परिवार के भीतर मानवीय मूल्यों को बचाने की। यही मानवता का भविष्य सुरक्षित करेगा और यही अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस का वास्तविक संदेश भी है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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