पश्चिम बंगाल में शिक्षा के क्षेत्र में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की ओर से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख शैक्षणिक प्रकल्प विद्या भारती के कम से कम एक हजार नए विद्यालय स्थापित करने का लक्ष्य केवल विद्यालयों की संख्या बढ़ाने की घोषणा नहीं है, बल्कि इसे राज्य की शिक्षा-दृष्टि में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए। 4 सितंबर 2026 को सामने आई इस घोषणा के अनुसार अगले एक वर्ष में राज्य के प्रत्येक जिले, नगरपालिका और पंचायत तक विद्या भारती के विद्यालयों का विस्तार करने का लक्ष्य रखा गया है। वर्तमान में पश्चिम बंगाल में विद्या भारती से जुड़े 313 विद्यालय संचालित होने की बात कही गई है। मुख्यमंत्री ने विद्या भारती के नेतृत्व को राज्य सचिवालय में शिक्षा विभाग के अधिकारियों के साथ मिलकर इस योजना को आगे बढ़ाने का भी निमंत्रण दिया है।

यह घोषणा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि विद्या भारती आज देश के सबसे बड़े स्वैच्छिक शिक्षा-उपक्रमों में से एक है। विद्या भारती के अपने उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उसका नेटवर्क देशभर में 12,500 से अधिक विद्यालयों तक फैला हुआ है और इनमें 35 लाख से अधिक विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। उसके विद्यालय पूर्व-प्राथमिक से लेकर उच्चतर माध्यमिक स्तर तक शिक्षा प्रदान करते हैं तथा खेल, संगीत, कला, विज्ञान, संस्कार और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे क्षेत्रों को भी शिक्षा का हिस्सा मानते हैं। हाल के समाचारों में देशभर में 12,000 से अधिक विद्यालयों और लगभग 10,000 बाल संस्कार केंद्रों का उल्लेख भी हुआ है। आंकड़ों में अंतर अलग-अलग वर्षों और संस्थागत गणना-पद्धतियों के कारण हो सकता है, लेकिन इससे विद्या भारती के व्यापक शैक्षिक विस्तार की तस्वीर स्पष्ट होती है।
विद्या भारती की विशेषता केवल यह नहीं है कि वह विद्यालयों की एक बड़ी शृंखला संचालित करती है। उसकी मूल अवधारणा शिक्षा को ज्ञान, संस्कार, चरित्र, राष्ट्रबोध और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ने की है। संस्था स्वयं अपने उद्देश्य में भारतीय मूल्यों और संस्कृति पर आधारित गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, राष्ट्रभावना, आत्मनिर्भरता और सामाजिक जिम्मेदारी को प्रमुखता देती है। ग्रामीण, जनजातीय, सीमावर्ती और अपेक्षाकृत वंचित क्षेत्रों में शिक्षा का विस्तार भी उसके घोषित उद्देश्यों का हिस्सा है। यहीं से पश्चिम बंगाल की नई पहल का व्यापक महत्व सामने आता है। बंगाल भारत की सांस्कृतिक चेतना का एक अत्यंत समृद्ध केंद्र रहा है। रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, रवींद्रनाथ ठाकुर, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और अनेक महापुरुषों ने भारतीय चिंतन, शिक्षा, साहित्य और राष्ट्रचेतना को नई दिशा दी। इसलिए बंगाल की शिक्षा व्यवस्था में भारतीय ज्ञान, संस्कृति, मातृभाषा, स्थानीय इतिहास और राष्ट्रीय दायित्व को उचित स्थान देना किसी राजनीतिक आग्रह से अधिक व्यापक सांस्कृतिक आवश्यकता के रूप में देखा जा सकता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी इसी दिशा में कई महत्वपूर्ण प्रावधान करती है। नीति का उद्देश्य विद्यार्थी में भारतीय होने के प्रति गहरी आत्मगौरव भावना विकसित करने के साथ ज्ञान, कौशल, मूल्यों और जिम्मेदार नागरिकता का विकास करना है। विशेष रूप से उल्लेखनीय यह है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा से जोड़ने की बात करती है। इसमें भारतीय ज्ञान प्रणालियों, जनजातीय ज्ञान, पारंपरिक सीखने की पद्धतियों, योग, दर्शन, साहित्य, कृषि, वास्तुकला, चिकित्सा, खेल और अन्य भारतीय योगदानों को वैज्ञानिक एवं प्रमाणिक ढंग से पाठ्यक्रम में स्थान देने की बात कही गई है। नीति यह भी कहती है कि पाठ्यचर्या भारतीय और स्थानीय संदर्भ, संस्कृति, परंपरा, भाषा, भूगोल तथा ज्ञान-परंपराओं से जुड़ी होनी चाहिए। इस दृष्टि से देखें तो विद्या भारती का शैक्षिक प्रयोग और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनेक लक्ष्य एक-दूसरे के पूरक दिखाई देते हैं। अंतर यह है कि नीति एक राष्ट्रीय नीति-ढांचा उपलब्ध कराती है, जबकि विद्या भारती जैसा सामाजिक संगठन लंबे समय से विद्यालय स्तर पर मूल्याधारित शिक्षा का अपना प्रयोग करता आया है। इसलिए यदि पश्चिम बंगाल सरकार इस विस्तार को गुणवत्तापूर्ण शिक्षक प्रशिक्षण, आधुनिक विज्ञान, तकनीक, डिजिटल शिक्षा, कौशल विकास और संवैधानिक मूल्यों के साथ जोड़ती है तो इसका प्रभाव केवल नए विद्यालय खोलने तक सीमित नहीं रहेगा।
विद्यालय खोलना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन अच्छे शिक्षक, प्रशिक्षित प्रधानाचार्य, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं, खेल सुविधाएं, डिजिटल संसाधन और गुणवत्तापूर्ण पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराना कहीं अधिक कठिन कार्य है। इसलिए इस पहल की सफलता संख्या से नहीं, शिक्षा की गुणवत्ता से मापी जानी चाहिए। यदि नए विद्यालय केवल भवन बनकर रह गए तो लक्ष्य अधूरा होगा; यदि वे अच्छे शिक्षक और अच्छे नागरिक बनाने के केंद्र बनते हैं, तभी यह पहल ऐतिहासिक सिद्ध होगी। यहीं स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। देश के अनेक सरकारी विद्यालय संसाधनों की कमी, शिक्षक-अभाव, आधारभूत सुविधाओं की कमजोरी, तकनीकी पिछड़ेपन और स्थानीय सहभागिता की कमी जैसी समस्याओं से जूझते रहे हैं। सरकार अकेले प्रत्येक विद्यालय की हर आवश्यकता पूरी करे, यह व्यावहारिक रूप से कठिन है।
ऐसे में सामाजिक और स्वयंसेवी संस्थाओं को सरकार के प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि सहयोगी के रूप में देखा जाना चाहिए। विद्या भारती के विस्तार के साथ यह सहयोग एक नया मॉडल विकसित कर सकता है-सरकार आधारभूत संरचना और नियामक सहयोग दे, स्वयंसेवी संगठन शैक्षिक नवाचार, शिक्षक प्रशिक्षण, सामुदायिक भागीदारी और मूल्याधारित कार्यक्रमों में योगदान करें तथा स्थानीय समाज विद्यालय को अपना संस्थान समझकर उसके विकास में सहभागी बने। विद्या भारती के विस्तार के साथ यदि व्यापक शिक्षक प्रशिक्षण अभियान चलाया जाए, जिसमें भारतीय दर्शन के साथ आधुनिक शिक्षाशास्त्र, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक, मनोविज्ञान, कौशल शिक्षा और नई मूल्यांकन पद्धतियां शामिल हों, तो यह पूरे देश के लिए अनुकरणीय मॉडल बन सकता है।
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने मुर्शिदाबाद और दक्षिण 24 परगना जैसे क्षेत्रों में विशेष विस्तार की बात भी कही है और वहां राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों को लेकर चिंता व्यक्त की है। इन राजनीतिक आरोपों से अलग शिक्षा की दृष्टि से मूल प्रश्न यह है कि संवेदनशील और सामाजिक रूप से विविध क्षेत्रों में विद्यालय नागरिकता-बोध, संवैधानिक कर्तव्य, सामाजिक समरसता, वैज्ञानिक सोच और राष्ट्रीय एकता को कितना मजबूत कर सकते हैं। शिक्षा का सर्वाेत्तम उत्तर किसी समुदाय के विरुद्ध अविश्वास पैदा करना नहीं, बल्कि हर बच्चे में जिम्मेदार और जागरूक भारतीय नागरिकता का निर्माण करना है। वंदे मातरम्, भारतीय संस्कृति और राष्ट्रभावना जैसे विषयों को लेकर मुख्यमंत्री के वक्तव्य ने बहस को राजनीतिक आयाम जरूर दिया है। लेकिन दीर्घकालीन दृष्टि से आवश्यकता ऐसी शिक्षा की है जिसमें राष्ट्रप्रेम स्वाभाविक संस्कार बने, आदेश या भय का विषय नहीं।
पश्चिम बंगाल की यह पहल इसलिए संपूर्ण राष्ट्र के लिए भी एक महत्वपूर्ण सबक या प्रेरणा है कि शिक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। सरकार, समाज, अभिभावक, शिक्षक, उद्योग, स्वयंसेवी संस्थाएं और पूर्व विद्यार्थी-सभी मिलकर शिक्षा का नया सामाजिक तंत्र बना सकते हैं। यदि विद्या भारती के पास संगठनात्मक अनुभव है, सरकार के पास संसाधन और नीतिगत शक्ति है तथा समाज के पास सहभागिता की क्षमता है, तो इन तीनों का समन्वय शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा परिवर्तन ला सकता है। आज भारत को ऐसी शिक्षा चाहिए जो आधुनिक भी हो और अपनी जड़ों से जुड़ी हुई भी; वैज्ञानिक भी हो और संस्कारवान भी; रोजगारपरक भी हो और चरित्रनिर्माणकारी भी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने इसके लिए नीतिगत दिशा दी है। अब आवश्यकता है कि विभिन्न राज्य और सामाजिक संगठन अपने-अपने स्तर पर इसके प्रभावी प्रयोग प्रस्तुत करें। पश्चिम बंगाल में विद्या भारती के एक हजार नए विद्यालयों का लक्ष्य इसी संदर्भ में एक प्रयोगशाला बन सकता है।
शुभेंदु अधिकारी की घोषणा इसलिए बधाई के योग्य है कि इसने शिक्षा को राजनीतिक विमर्श से आगे बढ़ाकर सामाजिक सहभागिता और भारतीय शिक्षा-दृष्टि के विमर्श के केंद्र में ला दिया है। अब असली परीक्षा घोषणा की नहीं, उसके क्रियान्वयन की है। यदि एक वर्ष में विद्यालयों की संख्या बढ़ाने के साथ शिक्षक की गुणवत्ता, पाठ्यक्रम की प्रासंगिकता, आधुनिक विज्ञान, तकनीकी दक्षता, भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिकता, संवैधानिक चेतना और सामाजिक समरसता को समान महत्व दिया गया, तो बंगाल का यह प्रयोग केवल बंगाल का नहीं रहेगा। यह भारत को यह संदेश दे सकता है कि शिक्षा व्यवस्था को बदलने के लिए केवल नई इमारतें नहीं, नई दृष्टि और समाज की सक्रिय सहभागिता भी आवश्यक है। और शायद यही आज के भारत की सबसे बड़ी शैक्षिक आवश्यकता है-’ज्ञान आधुनिक हो, दृष्टि वैज्ञानिक हो, चरित्र भारतीय हो और शिक्षा का अंतिम लक्ष्य राष्ट्र एवं मानवता का कल्याण हो।’

लेखक, पत्रकार, स्तंभकार