दिल्ली के जंतर-मंतर से संसद भवन तक हाल के आंदोलन के दौरान जो तनाव, टकराव और हिंसक घटनाएं देखने को मिलीं, वे केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं हैं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव, बैरिकेड तोड़ने के प्रयास, मेट्रो स्टेशन में जबरन प्रवेश की कोशिश, पुलिस द्वारा लाठीचार्ज और आंसू गैस का प्रयोग-ये सभी दृश्य उस लोकतांत्रिक संस्कृति के अनुरूप नहीं कहे जा सकते, जिसकी आधारशिला अहिंसा, संवाद और संवैधानिक मर्यादाओं पर रखी गई है। भारत आज आजादी के शताब्दी वर्ष 2047 की ओर बढ़ रहा है। यह केवल आर्थिक महाशक्ति बनने का लक्ष्य नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक परिपक्वता की कसौटी पर भी स्वयं को सिद्ध करने का अवसर है। यदि हम आज भी असहमति को हिंसा, टकराव और अराजकता के माध्यम से व्यक्त करेंगे, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होगी। लोकतंत्र की शक्ति सड़क पर शक्ति-प्रदर्शन में नहीं, बल्कि विचारों की शक्ति, संवाद की संस्कृति और संवैधानिक प्रक्रियाओं में निहित होती है।
राहुल गांधी द्वारा नीट पेपर लीक प्रकरण को लेकर चल रहे घरना-प्रदर्शन के दौरान अचानक अपने सहयोगी सांसदों के साथ प्रधानमंत्री आवास के निकट धरने पर बैठना और संसद की बजाय सड़क को राजनीतिक संघर्ष का मंच बनाना अनेक गंभीर प्रश्न खड़े करता है। जिस प्रकार इससे पहले कॉकरोच जनता पार्टी के तथाकथित छात्रों एवं कार्यकर्ताओं ने संसद चलो मार्च के दौरान तनावपूर्ण, अराजक एवं हिंसक माहौल बनाने की घटनाएं सामने आईं, उससे यह आशंका बलवती हुई कि कुछ राजनीतिक शक्तियां भारत में भी नेपाल जैसी अराजक परिस्थितियां पैदा करने को उजावले हैं। सरकार की सतर्कता और सुरक्षा एजेंसियों की समय रहते की गई कार्रवाई से, कुछ कमियों के बावजूद, इस बड़े संकट को टाल दिया गया, अन्यथा दिल्ली लंबे समय तक हिंसा और अशांति की चपेट में आ सकती थी। देश पहले भी नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध के दौरान शाहीन बाग में लगभग सौ दिनों तक एक प्रमुख सड़क के अवरुद्ध रहने और उससे आम नागरिकों को हुई भारी कठिनाइयों का अनुभव कर चुका है। लोकतंत्र में असहमति और विरोध का अधिकार निर्विवाद है, लेकिन उसका स्थान संसद, संवाद और संवैधानिक संस्थाएं हैं, न कि सड़क पर टकराव और अराजकता। विपक्ष यदि बार-बार ऐसे आंदोलनों को प्रोत्साहित करता है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि उसका उद्देश्य लोकतांत्रिक विमर्श को मजबूत करना है या राजनीतिक ध्रूवीकरण और अस्थिरता को बढ़ावा देना। जनता अपेक्षा करती है कि सभी दल संसद को सर्वाेच्च मंच मानते हुए वहीं जवाबदेही सुनिश्चित करें।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्ण और निरस्त्र सभा करने का अधिकार देता है। यह अधिकार लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान है। किंतु प्रत्येक अधिकार के साथ कर्तव्य और मर्यादा भी जुड़ी होती है। प्रदर्शन करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, पुलिस से टकराव करना, हिंसा फैलाना अथवा आम नागरिकों के जीवन को बाधित करना किसी भी दृष्टि से लोकतांत्रिक आचरण नहीं कहा जा सकता। यदि आंदोलन अपनी नैतिक शक्ति खो देता है, तो उसकी मांगें भी समाज की सहानुभूति खो बैठती हैं। यह भी उतना ही सत्य है कि लोकतंत्र केवल जनता के लिए नहीं, बल्कि सरकार के लिए भी उत्तरदायित्व का नाम है। सरकार को भी आंदोलनों को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर नहीं देखना चाहिए। जब भी किसी वर्ग, विशेषकर युवाओं और छात्रों में असंतोष उत्पन्न हो, तो उसका समय रहते समाधान खोजने का प्रयास होना चाहिए। संवाद के दरवाजे जितनी जल्दी खुलेंगे, टकराव की संभावनाएं उतनी ही कम होंगी। लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी शक्ति उसका धैर्य, संवेदनशीलता और संवाद की इच्छा होती है।
इतिहास साक्षी है कि भारत के अधिकांश सफल जनआंदोलन अहिंसा और संवाद की शक्ति से ही सफल हुए हैं। महात्मा गांधी ने विश्व को यह संदेश दिया कि सत्य और अहिंसा सबसे बड़े अस्त्र हैं। वर्ष 2011 का अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन भी इसका उदाहरण है। लाखों लोग सड़कों पर उतरे, लेकिन आंदोलन का नैतिक बल उसकी शांति और अनुशासन में था। उसी कारण सरकार को संवाद का रास्ता अपनाना पड़ा और पूरे देश में एक सकारात्मक बहस प्रारंभ हुई। इसके विपरीत जहां-जहां आंदोलनों ने हिंसा का मार्ग अपनाया, वहां उनका मूल उद्देश्य पीछे छूट गया और चर्चा केवल हिंसा तक सीमित होकर रह गई। आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर ऐसी कौन-सी शक्तियां हैं, जो सामान्य और भोली-भाली जनता एवं देश के युवाओं को हिंसा की ओर धकेल देती हैं? कौन-से तत्व आंदोलनों की दिशा बदलकर उन्हें अराजकता में परिवर्तित कर देते हैं? यह चिंता केवल सरकार की नहीं, पूरे समाज की होनी चाहिए। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, लेकिन यदि असहमति के मंच पर राष्ट्रविरोधी, अराजक अथवा हिंसक तत्व सक्रिय हो जाएं, तो उन्हें नियंत्रित करना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनिवार्य दायित्व बन जाता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ अराजकता की स्वतंत्रता नहीं हो सकता।
संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च मंदिर है। जंतर-मंतर लोकतांत्रिक विरोध का प्रतीक स्थल है। यदि इन दोनों के बीच हिंसा, तोड़फोड़ ण्चं अराजकता का दृश्य निर्मित होता है, तो यह केवल राजधानी की घटना नहीं रहती, बल्कि पूरे देश और विश्व के सामने भारतीय लोकतंत्र की छवि को प्रभावित करती है। लोकतंत्र की गरिमा इस बात में नहीं कि कौन अधिक आक्रामक है, बल्कि इस बात में है कि कौन अधिक संयमित और उत्तरदायी है। राजनीतिक दलों को भी आत्ममंथन करना होगा। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों लोकतंत्र के दो पहिए हैं। यदि दोनों के बीच संवाद समाप्त हो जाएगा, तो लोकतंत्र टकराव का अखाड़ा बन जाएगा। विपक्ष का दायित्व केवल विरोध करना नहीं, बल्कि रचनात्मक विकल्प प्रस्तुत करना भी है। उसी प्रकार सरकार का दायित्व केवल शक्ति प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि असहमति को सम्मानपूर्वक सुनना भी है। लोकतंत्र में किसी की पूर्ण विजय या पूर्ण पराजय नहीं होती, यहां अंततः संवाद, सहमति और समाधान ही सबसे बड़ी जीत होती है।

